Gopaldas Neeraj

(4 January 1925 - / Etawah, Uttar Pradesh / India)

स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से - Poem by Gopaldas Neeraj

स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई
पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई
पात-पात झर गये कि शाख़-शाख़ जल गई
चाह तो निकल सकी न पर उमर निकल गई
गीत अश्क बन गए छंद हो दफन गए
साथ के सभी दिऐ धुआँ पहन पहन गये
और हम झुके-झुके मोड़ पर रुके-रुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।

क्या शबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा
क्या जमाल था कि देख आइना मचल उठा
इस तरफ़ जमीन और आसमाँ उधर उठा
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा
एक दिन मगर यहाँ ऐसी कुछ हवा चली
लुट गयी कली-कली कि घुट गयी गली-गली
और हम लुटे-लुटे वक्त से पिटे-पिटे
साँस की शराब का खुमार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।

हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ
होठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ
हो सका न कुछ मगर शाम बन गई सहर
वह उठी लहर कि ढह गये किले बिखरबिखर
और हम डरे-डरे नीर नयन में भरे
ओढ़कर कफ़न पड़े मज़ार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।

माँग भर चली कि एक जब नई नई किरन
ढोलकें धुमुक उठीं ठुमक उठे चरन-चरन
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन चली दुल्हन
गाँव सब उमड़ पड़ा बहक उठे नयन-नयन
पर तभी ज़हर भरी गाज एक वह गिरी
पुँछ गया सिंदूर तार-तार हुई चूनरी
और हम अजान से दूर के मकान से
पालकी लिये हुए कहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।


Comments about स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से by Gopaldas Neeraj

  • Savita Tyagi (10/20/2018 8:19:00 AM)

    Such a pleasure to read this Geet again. I remember it from my childhood days. Thank you so much Neeraj Ji for sharing your Kala on Poemhunter. (Report)Reply

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  • (6/5/2013 12:42:00 PM)

    Neerajji Pranam ye geet mera sabse priy hai maine abhi abhi computer chalana sikha hai mai 6 kakksha me aapko mumbai me kanjurmarg me Birla compni indian smelting me suna tha aaj meri umra 50 sal ho gayi hai umrke Aakhri padav me maine shikh kar aapki kavita ko padha Aaj bhi Aapki Aawaj mere kano me gujti hai. Aakhir me Aapki kavita ke do line ke sath.chil kauon ke Adalat me hai mujrim koyal ye siyasat ka chalan sirf Daga deta hai, Sans ke bojh se jab rooh tadap uthti hai wo tera pyar hai jo dil ko hawa deta hai. (Report)Reply

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Poem Submitted: Wednesday, July 4, 2012

Poem Edited: Wednesday, July 4, 2012


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