दो शब्दshabd Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

दो शब्दshabd

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दो शब्द
शुक्रवार, ११ सितम्बर 2020

कहीं धुप है कहीं छाँव
मुझे प्यारा लगे मेरा गाँव
सब रहते साथ रखके समभाव
उनका बन गया है स्वभाव।

क्यों जाना मैंने कहीं दूर?
ना ढूंढना सुदूर
लगे सुहाना मुझे अपना संसार
इसी में समाया हुआ है सार।

ना वेर है ना दुश्मनी
सब की है कहानी अपनी
ला देती है आँखोंमें पानी
और लग जाता संसार फानी।

मुझे नहीं भाता किसी को दुःख पहुंचाना
सब तो लगे है मुझे अपना जाना
फिर काहे को कड़वाहट को लाना?
अपना कीमती समय क्यों गंवाना?

ना जोर है दुश्मन की बाजू में
ना शोर है शब्दो के बाणो में
बस प्रेमके दो शब्द कहने दो
मुजे अपने आप में रहने दो।

मेरा क्या है इस जहां में?
आज यहां तो कल वहां में
मेरी धुन को में खुद पहचानू
सबको अपना दिलीजान से मानु।

ये जल, ये वायु और धरती
कभी अपने वचन से ना मुकरती
ना फ़िक्र कल थी और आज भी है
ना कहने बताने में राज भी है।

डॉ जाडिआ हसमुख

दो शब्दshabd
Friday, September 11, 2020
Topic(s) of this poem: poem
COMMENTS OF THE POEM
Mehta Hasmukh Amathalal 11 September 2020

ना फ़िक्र कल थी और आज भी है ना कहने बताने में राज भी है। डॉ जाडिआ हसमुख

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Mehta Hasmukh Amathaal

Mehta Hasmukh Amathaal

Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
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