Shayari Page 34 Poem by Sankhajit Bhattacharjee

Shayari Page 34

Rating: 5.0

ईर्ष्या एक मानसिक रोग, कोई भाव नहीं।
धुलाई इसका इलाज, दवा कभी नहीं।
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स्वाधीन अगर होना है तो हम दोनों एक साथ मिलकर होंगें।
अगर दोनों में से कोई एक बंदी रहे गया तो दूसरे भी झेलेगा, तब हम एक साथ मरेंगे।
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कोई किसी का गुलाम नहीं होता।
हम सब अपने मन के गुलाम हैं, दिल यही कहता।
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कौन कब किसका गुलाम था, यह नहीं है बड़ी बात।
हम अपने दुश्मनों के गुलाम नहीं हैं- सिर्फ दोस्त बनायें, हमारी असली ताकत।
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ज्यादा सोचो मत, जो होगा देखा जायेगा।
सामना करो वक्त पर, ज्यादा सोचोगे तो जीवन रोक जायेगा।
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सही सोच कभी ज़िंदगी नहीं बनाती- सच यही।
सही काम और सही संस्कार जो बनाते हैं- खुद रहो सही।
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बाप दादा ने क्या काम किये हैं, वह कभी मत सोचो।
अपनी पसंद का काम पे शामिल हो और उन दोनों का मान बढ़ाओ।
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पिता से बड़ी माता, पितृतंत्र से बड़ी मातृशक्ति।
ताकत से बड़ी ममता और प्रेम से बड़ी भक्ति।
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COMMENTS OF THE POEM
Rajan T Renganathan 16 May 2023

Bahut badiya hai.

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Deepak S S 16 May 2023

ईर्ष्या शरीर को जलती है इसका घाव नहीं दिखता मर्ज़ ला इलाज है ये कोई दवा का असर नहीं दिखता

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Deepak S S 16 May 2023

Ye ghazal kam updesh adhik hai..... Gazal me jataya jaata hai, updesh mein bataya jaata hai... Pasand aayi aapki updesh vani 5 ****

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