ईर्ष्या एक मानसिक रोग, कोई भाव नहीं।
धुलाई इसका इलाज, दवा कभी नहीं।
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स्वाधीन अगर होना है तो हम दोनों एक साथ मिलकर होंगें।
अगर दोनों में से कोई एक बंदी रहे गया तो दूसरे भी झेलेगा, तब हम एक साथ मरेंगे।
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कोई किसी का गुलाम नहीं होता।
हम सब अपने मन के गुलाम हैं, दिल यही कहता।
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कौन कब किसका गुलाम था, यह नहीं है बड़ी बात।
हम अपने दुश्मनों के गुलाम नहीं हैं- सिर्फ दोस्त बनायें, हमारी असली ताकत।
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ज्यादा सोचो मत, जो होगा देखा जायेगा।
सामना करो वक्त पर, ज्यादा सोचोगे तो जीवन रोक जायेगा।
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सही सोच कभी ज़िंदगी नहीं बनाती- सच यही।
सही काम और सही संस्कार जो बनाते हैं- खुद रहो सही।
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बाप दादा ने क्या काम किये हैं, वह कभी मत सोचो।
अपनी पसंद का काम पे शामिल हो और उन दोनों का मान बढ़ाओ।
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पिता से बड़ी माता, पितृतंत्र से बड़ी मातृशक्ति।
ताकत से बड़ी ममता और प्रेम से बड़ी भक्ति।
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ईर्ष्या शरीर को जलती है इसका घाव नहीं दिखता मर्ज़ ला इलाज है ये कोई दवा का असर नहीं दिखता
Ye ghazal kam updesh adhik hai..... Gazal me jataya jaata hai, updesh mein bataya jaata hai... Pasand aayi aapki updesh vani 5 ****
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Bahut badiya hai.