सोच बुरी नहीं
रविवार, ९ फरवरी २०२०
सोच बुरी नहीं
पर लगती नहीं सही
ऐसा ना हो की चाँद भी शरमा जाए
अपने किये पर पछतावा हो जाए ।
आदत हो जाए तो अच्छा है
ये तो अपनी ही पृच्छा है
बहुधा लोग कतराते है
अपने आप से शरमाते है।
कई बार घृणा सी आ जाती है
अपने आपको कोसती रहती है
"क्यों किया था ऐसा मैंने "?
क्यों जबान लगती है अब अटकने?
दर्पण मुझे कहता है
बारबार लताड़ता है
तू अपने आपको क्या समझता है?
अब तेरी यही खता है।
ये तो लेनेके देने पड गए!
हम तो उलझन के भंवर में फंस गए
"अरे हो गया तो हो गया"!
पर मन में एक भय सा छा गया।
हम सब जानते है
पर दिखावा करते रहते है
क्या जरुरत है मन को कुरेदने की?
अपने खुद को समझाने की।
मन लगता है बहाने ढूंढ ने
चिडता है स्वयं से बात कर ने
"कर ली ना जिद अपनी पूरी"
और कोई ना रह जाए अधूरी।
हसमुख मेहता
Aabhaar: Aditi Jamwal
Aditi Raj Jamwal Lovely 1 Hide or report this Like · Reply · 17m
मन लगता है बहाने ढूंढ ने चिडता है स्वयं से बात कर ने " कर ली ना जिद अपनी पूरी" और कोई ना रह जाए अधूरी। हसमुख मेहता Aabhaar: Aditi Jamwal
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Aditi Raj Jamwal ... nice... well said