सुबह थी, रात थी
सोमवार, ५ अगस्त २०१९
मिल जाओ ना अब तो
गुजर गया वक्त तो
कभी वापस नहीं आएगा
बस दिल को तड़पाता ही रहेगा।
वो क्या दिन थे?
सुबह थी, रातथी
चाँद था, चांदनी थी
हर पल मानो अपना ही था ।
वक्त मानो कैसे रूठ गया!
सब खुशियां अपने साथ ले गया
छोड़ गया पीछे गमगीनी की छाया
मुझे उसने खूब सताया।
मैंने मन को खूब मनाया
तू हरदम रही मेरा साया
तेरे चेहरे ने मुझे बहुत लुभाया
हर लब्ज मुझे बहुत भाया।
साथ तो था तेरा
पर नहीं था वो सवेरा
बस कहीं कहीं दिख जाता था अन्धेरा
घने बादलों ने मुझे बहुत ही घेरा।
मन में विश्वास था
आशा का एक किरण था
"तुम जरूर मिलोगी"
और फिर से अपनाओगी।
मै भी मन मनाता रहा
सूरज भी रोज रौशनी देता रहा
मेरी आशा कभी न डगमगाई
तूने भी तो खूब सगाई निभाई।
हसमुख मेहता
मै भी मन मनाता रहा सूरज भी रोज रौशनी देता रहा मेरी आशा कभी न डगमगाई तूने भी तो खूब सगाई निभाई। हसमुख मेहता Hasmukh Amathalal
সাহনিন সুলতানা 1 Edit or delete this Like · Reply · 1m
S.r. Chandrslekha Thank you so much dear great poet.What a wonderful write! 1 Hide or report this Like · Reply · 4h
welcome s r chandrslekha 1 Edit or delete this Like · Reply · 1m
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welcome s r lekha 1 Edit or delete this Like · Reply · 1m