सुर से सुर... Sur Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

सुर से सुर... Sur

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सुर से सुर
शनिवार, १७ नवंबर २०१८

मनमे सजाए सपने
वो लगे मुझे अपने
में देखूं और शरमाऊं
मन ही मन हरखाऊ।

वो रहे परदेशी
में देखती रही एकीटशी
मन से मैंने मान लिया
उनको मैंने दिल से अपना लिया।

मन पर ना रहा काबू
दिल से एक ही चीज मांगू
कर ना कभी ना इंकार
मेरा तो है स्वीकार।

संसार की है ये रीत
सब को हो जाती प्रीत
मन के मिल जाते मित
आँखे देखती रहे अमिट।

हमने जाना है बहुत दूर
सुर से मिलाना है सुर
ताल से मिलाना है ताल
पूछते रहना है उनके हाल।

हसमुख अमथालालमेहता

सुर से सुर... Sur
Saturday, November 17, 2018
Topic(s) of this poem: poem
COMMENTS OF THE POEM
Mehta Hasmukh Amathalal 17 November 2018

हमने जाना है बहुत दूर सुर से मिलाना है सुर ताल से मिलाना है ताल पूछते रहना है उनके हाल। हसमुख अमथालालमेहता

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Mehta Hasmukh Amathaal

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Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
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