तुम बिन.. Tumbin Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

तुम बिन.. Tumbin

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तुम बिन
मगलवार, ४ अगस्त २०२०

तुम बिन में जाऊं कहाँ
तू बता दे पता है कहाँ
दिल लगता नहीं यहां
मेरे दिल का जहां है कहाँ?

तू पास है मगर कितनी है दूर
बनी फिरती हो मेरे जन्नत की हूर
में टकटकी लगाए देखु चारो और
पर ना आए तू मेरी नजर।

मन रहता बेचेन, दिन कटता नहीं
राते करवटे लेता पर सोता नहीं
तारे गिनना मुझे आता नहीं
अब बात मेरे बस मे नहीं।

बताओ तुम अब में जाऊं कहाँ?
तारे भी हंस रहे मेरे हाल पर
छुपते छुपते व्यंग कस कर
में सर झुकाउ शर्म करकर।

में आँखे मूंदकर बंध करलु
अपने आपको थोड़ा सा सोच लू
बिन तेरे अब चारा कहाँ?
बता दे अब में जाऊं कहाँ?

बिन चेहरा अब तेरा देखे
लगता नहीं प्यार कैसे चखे?
पता नहीं कैसे लग गई आँखे!
आँखों से गिरे आंसू पर ना कोई देखे।

तुम बिन में अब जाऊं कहाँ
दिल मेरा लगता नहीं यहां
आते हो तो आ जाओ
मेरे दिल को इतना ना सताओ।

ना कह पाउँगा में दिल की बाते
याद करता रहा मे जागते सोते
ना बनता कुछ अब रोते रोते
पहेली ना बुज पाएगी अब तो खोते खोते।

Dr. Jadia Hasmukh

तुम बिन.. Tumbin
Tuesday, August 4, 2020
Topic(s) of this poem: poem
COMMENTS OF THE POEM
Mehta Hasmukh Amathalal 04 August 2020

ना बनता कुछ अब रोते रोते पहेली ना बुज पाएगी अब तो खोते खोते। Dr. Jadia Hasmukh

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Mehta Hasmukh Amathaal

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Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
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