उठ जा... Uth Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

उठ जा... Uth

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उठ जा
गुरूवार, ११ जुलाई २०१९

उठ जा, उठ जा
उठ के पहले नहाके आ
फिर नाश्ता कर करके
सलाम कर।

झुककर हमेशा चलकर
आँखों को ना मिलाया कर
बस कान अपने खुले रख कर
बाते सब की सूना कर।

तू है चंचल और नटखट,
करती रहती है टक-टक
बात हमेशा कम किया कर
गम को ज्यादा दिल में ना रखाकर।

यूँही सदा मिलते रहना
वाते अपनी बनाते रहना
अपना उल्लू सीधा करते रहना
सब को बेवकूफ ना बनाया करना।

ना रुकना कभी ना रुकना
बस अपने दिल से चहकते रहना
पंछी की तरह उड़ते रहना और गाना
अपनी मजिल पाके ही रहना।

कोई सुने, या ना सुने
तुम बस गुनगुनाते रहना
समय आएगा और लोग भी सुनेंगे
तेरी बात को जरूर समझेंगे।

हसमुख मेहता

उठ जा... Uth
Thursday, July 11, 2019
Topic(s) of this poem: poem
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कोई सुने, या ना सुने तुम बस गुनगुनाते रहना समय आएगा और लोग भी सुनेंगे तेरी बात को जरूर समझेंगे। हसमुख मेहता Hasmukh Amathalal

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Mehta Hasmukh Amathaal

Mehta Hasmukh Amathaal

Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
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