यही तो है पहचान।
फिर भी यहाँ प्रेम ज्यादा है
भवनभी बहुत उमदा है
प्यार तो सर्वत्र है पर बेहूदा नहीं
लोग मर मिटने पर आमादा नही।
मेरे लोग स्वाभिमानी
ना करते मनमानी
पर गुजरती है छैलछबीला
आत्मसम्मान से भरा रंगीला
ना कोई छल है ना कोई रक्तपात
न कोई देखे नफरत से ना करे चंचुपात
बस अपने में मगन रहते है
और गगन को चूमते है।
भोग यहां संजोग यहाँ
प्रेम का अनोखा आस्मान यहां
हर कोई बोले प्यार की बोली
खूब खेलते है लोग प्यार से होली।
लोग नही है व्यसनी ओर आलसी
नहीं करते छेड़खानी और ऐयासी
कारोबारी है और उद्धमी
पर रखते है बड़ी सादगी।
प्यार का कहीं भी मोल नहीं
वो तो बेजुबान और अनमोल सही
सब करते है स्वीकार और सन्मान
प्रेम की यही तो है पहचान।
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Daxa Pansare Saras poem Unlike · Reply · 1 · 4 hrs
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