(For Eduardo Chirinos)
Downstairs I left a candle burning
In its light I'll read a few lines when I return
By the time I returned the candle had burned out
Those few lines had faded like innocence
You walk with me
The way moon walks along with a child sitting in a train window
I stood in the balcony one day
Waved a handkerchief toward the sky
Those who have gone without saying their goodbyes
Will recognize it even from far
In my handkerchief they have left behind their tears
The way early humans left behind their etchings on cave walls
Lyotard said, every sentence is a now
No. Actually it's a memory of now
Every memory is a poem
In our books, the count of the unwritten poems is so much more
...
Once upon a time, there was a Seed. It had an Earth. They both loved each other. The Seed rollicked and rolled in the lap of the Earth, and wanted to remain there forever. The Earth kept it secure within her arms and would repeatedly urge it to sprout. The Seed was reluctant. The Earth thirsted in fecund heat. One day, it rained and the Seed could not defer its sprouting. Half-heartedly, it put forth shoots and soon thereafter became delightfully absorbed in growing. Mental abstraction is a delightful idyll too. It grew a good deal and rose to a great height. The earth does not grow in height but spreads out. Much as a tree may expand by spreading out, its upward growth is its identity.
They both grew apart. The roots stayed in the ground, so to speak, but to date, who has ever regarded roots as trees? A tree is that which furthers itself away from the earth. If it remained glued, it would be grass. The Tree wishes to go back being a Seed again. The Earth wishes to take back her blessing. It saddens the Tree that it can never again become that single Seed. However, it would certainly turn into a thousand seeds. The Earth would never be able to feel the soft touch of that very same Seed. For her, the Tree would merely be a shadow.
Every single thing in life does not have an obverse to it. Night is not a dark Day, and Day is not a bright Night. Moon not a cold Sun, and Sun not a hot Moon. The Earth and the Sky meet nowhere. Nowhere at all.
I go and stand very near the Tree and whisper, You hear me, you are Seed even now. That very same Seed. Don't let height intoxicate you. Even now you are not grown. You are merely Earth's imagination.
All trees grow in imagination. In memory, they always remain seeds.
...
एक पीली खिड़की इस तरह खुलती है
जैसे खुल रही हों किसी फूल की पंखुड़ियां.
एक चिड़िया पिंजरे की सलाखों को ऐसे कुतरती है
जैसे चुग रही हो अपने ही खेत में धान की बालियां.
मेरे कुछ सपने अब सूख गए हैं
इन दिनों उनसे अलाव जलाता हूं
और जो सपने हरे हैं
उन्हें बटोरकर एक बकरी की भूख मिटाता हूं
मेरी भाषा का सबसे बूढ़ा कवि लाइब्रेरी से लाया है मोटी किताबें
चौराहे पर बैठ सोने की अशर्फि़यों की तरह बांटता है शब्द
मेरे पड़ोस की बुढ़िया ने ईजाद किया है एक यंत्र जिसमें आंसू डालो, तो
पीने लायक़ पानी अलग हो जाता है, खाने लायक़ नमक अलग.
एक मां इतने ममत्व से देखती है अपनी संतान को
कि उसके दूध की धार से बहने लगती हैं कई नदियां
जो धरती पर बिखरे रक्त के गहरे लाल रंग को
प्रेम के हल्के गुलाबी रंग में बदल देती हैं.
...
This is one of the rhymes
Taught in Shri Guru Gobind Singh Hindi Primary School
One of the quavering anthems of olden days sung by those
Now addressed as ma-baba-grandma
It is someone's idea of fun or pastime, rhythm-non-rhythm-marching-rhythm
Oh look, the vermilion-anointed forehead of the Queen is still the same
Or to all of history it shows the power of the power game.
This is the broad formula of Eastern metaphysics -
That everyone has to die one day.
Oops! In the rhyme-story invoked at the end,
No one among the three died dawdling, they died
Doing their work, hup ho! they died fighting their war, bravo!
Why isn't there a word like martyr for them - bearing such a placard
Was the man who just passed by me, named
Swami Varg-Chaitanya Kirti-Akankshi 1008¹
Like our tribal poet, Bhujang Meshram²
I too had asked innocently
About Sivakasi³ the city that makes firecrackers -
Why doesn't its childhood ever go away?
The less the IQ, the better the poem would be; life too.
I say, wherever you have to live, take retirement from there;
In so doing, you'd derive the pleasure of a duplex house :-)
Dear me, no!
This is not a classroom struggle between Class 1-A and 1-B
This struggle is intricate, as cryptic as my class-map.
To present anything the way it is, would be against our customs
So the way I've come to office in my Bermudas and t-shirt
(I warned you this would happen)
The same way in this preshentation I päshte
A moving song of my middle class, read carefully:
The King died in the war he fought
The Queen died in the cooking pot
The Children died studying a lot . . .
...
चारों तरफ़ बिखरे हैं काग़ज़
एक काग़ज़ पर है किसी ज़माने का गीत
एक पर घोड़ा, थोड़ी हरी घास
एक पर प्रेम
एक काग़ज़ पर नामकरण का न्यौता था
एक पर शोक
एक पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था क़त्ल
एक ऐसी हालत में था कि
उस पर लिखा पढ़ा नहीं जा सकता
एक पर फ़ोन नंबर लिखे थे
पर उनके नाम नहीं थे
एक ठसाठस भरा था शब्दों से
एक पर पोंकती हुई क़लम के धब्बे थे
एक पर उँगलियों की मैल
एक ने अब भी अपनी तहों में समोसे की गंध दाब रखी थी
एक काग़ज़ को तहकर किसी ने हवाई जहाज़ बनाया था
एक नाव बनने के इंतज़ार में था
एक अपने पीलेपन से मूल्यवान था
एक अपनी सफ़ेदी से
एक को हरा पत्ता कहा जाता था
एक काग़ज़ बार-बार उठकर आता
चाहते हुए कि उसके हाशिए पर कुछ लिखा जाए
एक काग़ज़ कल आएगा
और इन सबके बीच रहने लगेगा
और इनमें कभी झगड़ा नहीं होगा
...
कविता को उपयोगितावादी दृष्टिकोण से देखना मुझे नहीं पसन्द।
फिर भी मन में कई बार आता है ख़याल
कि कोई मानव-बम
बटन दबाना भूल जाए
कि उस समय वह कविता पढ़ रहा था
उसके बाद अपना बम उतार कर
ख़ुद एक मानव-कविता बन जाए
ताकि दूसरे बम उसे पढ़ सकें।
...
फूल चढ़ाने के बाद उस लाश को घेरकर हम खड़े हो गए थे।
सम्मान से सिर झुकाए. उसका चेहरा निहारते।
हममें से कई को लगा कि पल-भर को लाश के होंठ हिले थे।
हाँ, हममें से कई को लगा था वैसा, पर हम चुप थे।
एक ने उसके नथुनों के पास उँगली रखकर जाँच भी लिया था।
उसके दाह के हफ़्तों बाद तक लोगों में चर्चा थी कि
मरने के बाद भी उस लाश के होंठ पल-भर को हिले थे।
कैफ़े चलाने वाली एक बुढि़या, जो रिश्ते में उसकी कुछ नहीं लगती थी,
बिना किसी भावुकता के उसने एक रोज़ मुझसे कहा,
मुझे विश्वास था, वह आएगा, मरने के बाद भी आएगा
अपना अधूरा चुम्बन पूरा करने।
53 साल पहले जब वह 17 का था
गली के पीछे टूटे बल्ब वाले लैम्पपोस्ट के नीचे
एक लड़की का चुम्बन अधूरा छोड़कर भाग गया था।
...
अगर तुम एक देश बनाते, तो वह एक मौन देश होता : तुम्हारे रचे शब्दकोश मौन होते : तुमने कभी देवताओं के आगे हाथ नहीं जोड़ा : ताउम्र तुम एक दृश्य रचते रहे : उनमें तुम मानसिक आँसुओं की तरह अदृश्य रहे
अर्थ की हर तलाश अन्तत: एक व्यर्थ है : इस धरती पर जितने बुद्ध, जितने मसीहा आए, इस व्यर्थ को कुछ नए शब्दों में अभिव्यक्त कर गए : माँ की तरफ़ से मैं पीड़ा का वंशज हूँ : पिता की तरफ़ से अकेलेपन का : जब भी मैं घर की दहलीज़ लाँघता हूँ : मैं एकान्त का इतिहास लाँघता हूँ
गुप्त प्रेमी मरकर कहाँ जाते हैं?
सड़क की तरफ़ खुलने वाली तुम्हारी खिड़की के सामने
लगे खम्भे पर बल्ब बनकर चमकते हैं
उनके मर चुकने की ख़बर भी बहुत-बहुत दिनों तक
नहीं मिल पाती
मृत्यु का स्मरण
तमाम अनैक्य का शमन करता है
मेरी आँखें मेरे घुटनों में लगी हैं
मैंने जीवन को हमेशा
विनम्रता से झुककर देखा
थके क़दमों से एक बूढ़ा सड़क पर चला जा रहा
वह विघटित है
उसके विघटन का कोई अतीत मुझे नहीं पता
मैं उसके चलने की शैली को देख
उसके अतीत के विघटन की कल्पना करता हूँ
वह अपनी सज़ा काट चुका है
कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि जज साहब उसे
बाइज़्ज़त बरी कर दें
जो कहते हैं भविष्य दिखता नहीं, मैं उन पर यक़ीन नहीं करता
मैं अपने भविष्यों को सड़कों पर भटकता देखता हूँ
उसी तरह मेरे भविष्य
मुझे देख अपना
अतीत जान लेते हैं
मैं वह शहर हूँ जिसकी वर्तनी व उच्चारण
बार-बार बदल देता
एक ताक़तवर राजा
यह मेरी देह का भूगोल है :
मैं आईने के सामने जब भी निर्वस्त्र खड़ा होता हूँ,
मुझे लगता है,
मैं एक भौगोलिक असफलता हूँ
...
शहर के बाहर पुल के नीचे कचरे के ढेर के बीचोंबीच
मेरी भाषा का सबसे बूढ़ा कवि चाय में डबलरोटी डुबोकर खाता है
उसने अफ़ज़़ाल से भी पहले शायरी ईजाद की थी
सारे देवता जूँ बनकर उसकी दाढ़ी में रहते हैं
उसके शरीर पर जितने बाल हैं, वे उसकी अनलिखी कविताएँ हैं
वह उँगलियों से हवा में शब्द उकेरता है
इस तरह, हर रात अपने अतीत को लिखता है एक चिट्ठी
जो लिफ़ाफ़ा खोजने से पहले ही खो जाती है
मरने से पहले एक बार
कम से कम एक बार
उस औरत का सही नाम और चेहरा याद करना चाहता है
जो किसी ज़माने में उसकी कविताओं की किताब
अपने तकिए के नीचे दबाकर सोती थी
...
बहुत सारी रातें मैंने काम करके बिताई हैं
लिखते हुए, पढ़ते हुए.
हमेशा अकेला ही रहा, इसलिए महज़ ख़ुद से लड़ते हुए.
लेकिन मैं याद करता हूँ उन रातों को
जब मैंने कुछ नहीं किया, पैरों को मेज़ पर फैलाकर बैठा
दीवार पर बैठे मच्छर को बौद्ध-दर्शन की किताब से दबा दिया.
काँच के गिलास को उँगलियों से खिसकाकर फ़र्श पर गिरा दिया,
महज़ यह जानने के लिए कि
चीज़ों के टूटने में भी संगीत होता है।
एक रात बरामदे में झाड़ू लगाया और उसी बहाने आधी सड़क भी साफ़ कर दी
किताबों से धूल हटाने की कोशिश की तो जाना-
साहित्य और धूल में वर-वधू का नाता है.
बाक़सम, इस बात ने मुझे थोड़ा विनम्र बनाया.
मैंने धूल को साहित्य और साहित्य को धूल जितना सम्मान देना सीखा।
कुछ गोपनीय अपराध किए
तीस साल पुरानी एक लड़की को फेसबुक पर खोजता रहा
और जाना कि पुरानी लड़कियां ऐसे नहीं मिलतीं -
शादी के बाद वे अपना नाम-सरनेम बदल लेती हैं।
सीटी बजाते हुए सड़कों पर तफ़रीह की
और एक बूढ़े चौकीदार के साथ सूखी टहनियां तलाशीं
ताकि वह अलाव ताप सके।
एक रात जब सिगरेट ख़त्म हो गई तब बड़ी मेहनत से ढूँढ़ा उस चौकीदार को.
उसने मुझे पहचान लिया और अपनी बीड़ी का आधा बण्डल मुझे थमा दिया।
एक औरत से मैंने सिर्फ़ एक वक़्त की रोटी का वादा किया था
जवाब में दूसरे वक़्त भूखी रहती थी वह.
आधी रात मैं उसे कार में बिठाता और शहर से बहुत दूर ढाबे में ले जाता.
वह आधी अंगड़ाई जितनी थी, आधी रोटी जितनी, आधी खुली खिड़की जितनी,
आधे लगे नारे जितनी.
खाना खाने के बाद हम प्रॉपर्टी के रेट्स पर बहसें करते
और मिट्टी पर मण्टो का नाम लिखते थे.
एक रात एक पुलिसवाले ने मुझे ज़ोर से डाँटा कि क्यों घूम रहा है इतनी रात को?
मैंने भी उसे चमका दिया कि लोग मुझे हिन्दी का बड़ा कवि मानते हैं, तुम ऐसे मुझे डाँट नहीं सकते।
बिफरकर वह बोला, साले, चार डण्डे मारूँगा तेरे पिछवाड़े. घर जाकर सो जा.
मैंने उसके साथ बैठकर तीन सिगरेटें पीं. वह इस बात से परेशान था
कि उसका साहब एक नम्बर का चमड़ी है
और वह अपनी बेटी को पुलिस में नहीं आने देगा.
अपनी मोटरसाइकिल पर बिठाकर मुझे घर छोड़ गया।
एक रात जब मैं पैदल भटक रहा था, कुछ कुत्ते भौंकने लगे मुझ पर।
मैंने दस्तायेव्स्की का एक हार्ड-बाउण्ड मोटा उपन्यास उन्हें दे मारा.
पर कुछ पल बाद ही कुत्ते फिर से भौंकने लगे.
मैंने इसे फ़्योदर की एक और नाकामी मानी
और मन ही मन सोचा :
यह दुनिया माईला... नाम्या ढसाळ का गाण्डूबगीचा है।
जिन रातों को मैंने मोटी-मोटी किताबें पढ़ीं,
कुछ कवियों को सराहा, कई पर नाक-भौं सिकोड़ी,
जिन रातों को बैठकर मैंने अपनी कविताएँ सुधारीं, गद्य लिखे -
मैं उन रातों को कभी याद नहीं करता
न ही वे चीज़ें याद आती हैं जो मैंने लिखी हैं -
वे बेशक भूल जाने लायक़ हैं.
पर जो चीज़ मैं नहीं भूल पाता, वह है अपनी रातों की आवारगी.
न पैसा न दमड़ी, न किताब न कविता
जब मरूँगा, छाती से बाँध के ले जाऊँगा ये अपनी आवारगी।
और हाँ, जाने कितनी रातें मैंने छत पर गुज़ारी हैं.
कभी रेलिंग से टिककर धुआँ उड़ाते. कभी नंगी फ़र्श पर चित लेटे
आकाश निहारते.
ख़ुद से कहा है बारहा - लोग तुम्हें कितना भी रूमानी कहें गीत चतुर्वेदी
आँसू, गुलाब और सितारे से कभी बेवफ़ाई मत करना.
कविता ख़राब बन जाए, वान्दा नहीं
पर दिल को इन्हीं तीनों से माँजना - हमेशा साफ़ रहेगा.
अंतत: ख़ुद कवि को ही करनी होती है
अपनी बेचैनियों की हिफ़ाज़त।
कविता की शीर्षक मोहसिन अली नक़वी की एक ग़ज़ल की एक पंक्ति है
गाण्डूबगीचा' मराठी कवि नामदेव ढसाळ के एक कविता-संग्रह का नाम है
...
रोटी बेलकर उसने तवे पर बिछाई
और जिस समय उसे पलट देना था रोटी को
ठीक उसी समय एक लड़की का फ़ोन आ गया.
वह देर तक भूले रहा रोटी पलटना.
मैं वही रोटी हूँ.
एक तरफ़ से कच्ची. दूसरी तरफ़ से जली हुई।
उस स्कूल में कोई बेंच नहीं थी, कमरा भी नहीं था विधिवत
इमारत खण्डहर थी.
बारिश का पानी फ़र्श पर बिखरा था और बीच की सूखी जगह पर
फटा हुआ टाट बिछाकर बैठे बच्चे हिन्दी में पहाड़ा रट रहे थे.
सरसराते हुए गुज़र जाता है एक डरावना गोजर
एक बच्चे की जाँघ के पास से.
अमर चिउँटियों के दस्ते में से कोई दिलजली चिउँटी
निकर के भीतर घुसकर काट जाती है.
नहीं, मैं वह स्कूल नहीं, वह बच्चा भी नहीं, गोजर भी नहीं हूँ
न अमर हूँ, न चिउँटी.
मैं वह फटा हुआ टाट हूँ।
गोल्ड स्पॉट पीने की ज़िद में घर से पैसे लेकर निकला है एक बच्चा.
उसकी क़ीमत सात रुपए है. बच्चे की जेब में पाँच रुपए।
माँ से दो रुपए और लेने के लिए घर की तरफ़ लौटता बच्चा
पाँच बार जाँचता है जेब में हाथ डाल कि
पाँच का वह नोट सलामत है.
घर पहुँचते-पहुँचते उसके होश उड़ जाते हैं कि जाने कहाँ
गिर गया पाँच रुपए का वह नोट। वह पाँच दिन तक रोता रहा।
हाँ, आपने सही समझा इस बार,
मैं वह पाँच रुपए का नोट हूँ.
उस बच्चे की आजीवन सम्पत्ति में
पाँच रुपए की कमी की तरह मैं हमेशा रहूँगा।
मैं भगोने से बाहर गिर गई उबलती हुई चाय हूँ.
सब्ज़ी काटते समय उँगली पर लगा चाक़ू का घाव हूँ.
वीरेन डंगवाल द्वारा ली गई हल्दीराम भुजिया की क़सम हूँ
अरुण कोलटकर की भीगी हुई बही हूँ.
और...
और...
चलो मियाँ, बहुत हुआ.
अगले तेरह सौ चौदह पन्नों तक लिख सकता हूँ यह सब.
‘मैं क्या हूँ' के इतने सारे उत्तर तो मैंने ही बता दिए
बाक़ी की कल्पना आप ख़ुद कर लेना
क्योंकि मैं जि़म्मेदारी से भागते पुरुषों की
सकुचाई जल्दबाज़ी हूँ, अलसाई हड़बड़ाहट हूँ
चलते-चलते बता दूँ
ठीक इस घड़ी, इस समय
मैं दुनिया का सबसे सुन्दर मनुष्य हूँ
मेरे हाथ में मेरे प्रिय कवि का नया कविता-संग्रह है।
...
कितनी ही पीड़ाएँ हैं
जिनके लिए कोई ध्वनि नहीं
ऐसी भी होती है स्थिरता
जो हूबहू किसी दृश्य में बंधती नहीं
ओस से निकलती है सुबह
मन को गीला करने की जि़म्मेदारी उस पर है
शाम झाँकती है बारिश से
बचे-खुचे को भिगो जाती है
धूप धीरे-धीरे जमा होती है
क़मीज़ और पीठ के बीच की जगह में
रह-रहकर झुलसाती है
माथा चूमना
किसी की आत्मा चूमने जैसा है
कौन देख पाता है
आत्मा के गालों को सुर्ख़ होते
दुख के लिए हमेशा तर्क तलाशना
एक ख़राब किस्म की कठोरता है
...
उसके बाल बिखरे हुए थे, दाढ़ी झूल रही थी
कपड़े गंदे थे, हाथ में थैली थी...
उसके रूप का वर्णन कई बार
कहानियों, कविताओं, लेखों, ऑफ़बीट ख़बरों में हो चुका है
जिनके आधार पर
वह दीन-हीन किस्म का पगलेट लग रहा था
और लटपट-लटपट चल रहा था
और शायद काम के बाद घर लौट रहा था
जिस सड़क पर वह चल रहा था
उस पर और भी लोग थे
रफ्तार की क्रांति करते स्कूटर, बाइक्स
और तेज संगीत बाहर फेंकती कारें थीं
सामने रोशनी से भीगा संचार क्रांति का शो-रूम था
बगल में सूचना क्रांति करता नीमअंधेरे में डूबा अखबार भवन
बावजूद उस सड़क पर कोई क्रांति नहीं थी
गड्ढे थे, कीचड़ था, गिट्टियाँ और रेत थीं
इतनी सारी चीजें थीं पर किसी का ध्यान
उस पर नहीं था सिवाय वहाँ के कुत्तों के
वे उस पर क्यों भौंके
क्यों उस पर देर तक भौंकते रहे
क्यों देर तक भौंककर उसे आगे तक खदेड़ आए
क्यों उसकी लटपट चाल की रफ्तार को बढ़ा दिया उन्होंने
क्यों चुपचाप अपने रास्ते जा रहे एक आदमी को झल्ला दिया
जिसमें संतों जैसी निर्बलता, गरीबों जैसी निरीहता
ईश्वर जैसी निस्पृहता और शराबियों जैसी लोच थी
किसी का नुकसान करने की क्षमता रखने वालों का
एकादश बनाया जाए तो जिसे
सब्स्टीट्यूट जैसा भी न रखना चाहे कोई
ऐसे उस बेकार के आदमी पर क्यों भौंके कुत्ते
कुत्तों का भौंकना बहुत साधारण घटना है
वे कभी और किसी भी समय भौंक सकते हैं
जो घरों में बंधे होते हैं दो वक़्त का खाना पाते हैं
और जिन्हें शाम को बाकायदा पॉटी कराने के लिए
सड़क या पार्क में घुमाया जाता है
भौंककर वफादारी जताने की उनकी बेशुमार गाथाएँ हैं
लेकिन जिनका कोई मालिक नहीं होता
उनका वफादारी से क्या रिश्ता
जो पलते ही हैं सड़क पर
वे कुत्ते आखिर क्या जाहिर करने के लिए भौंकते हैं
ये उनकी मौज है या
अपनी धुन में जा रहे किसी की धुन से उन्हें रश्क है
वे कोई पुराना बदला चुकाना चाहते हैं या
टपोरियों की तरह सिर्फ बोंबाबोंब करते हैं
ये माना मैंने कि
एक आदमी अच्छे कपड़े नहीं पहन सकता
वह अपने बदन को सजाकर नहीं रख सकता
कि उसका हवास उससे बारहा दगा करता है
लेकिन यह ऐसा तो कोई दोष नहीं
प्यारे कुत्तो
कि तुम उनके पीछे पड़ जाओ
और भौंकते-भौंकते अंतरिक्ष तक खदेड़ आओ
आखिर कौन देता है तुम्हें यह इल्म
कि किस पर भौंका जाए और
किससे राजा बेटा की तरह शेक हैंड किया जाए
जो अपने हुलिए से इस दुनिया की सुंदरता को नहीं बढ़ा पाते
ऐसों से किस जन्म का बैर है भाई
यह भौंकने की भूख है या तिरस्कार की प्यास
या यह खौफ कि सड़क का कोई आदमी
तुम्हारी सड़क से अपना हिस्सा न लूट ले जाए
जिसके पीछे पड़े कुत्ते
उसे तो कौम ने पहले ही बाहर का रास्ता दिखा दिया था
उसे दो फलांग और छोड़ आना किसकी सुरक्षा है
उसके हाथ में थैली थी
जिसमें घरवालों के लिए लिया होगा सामान
वह सोच रहा होगा अगले दिन की मज़दूरी के बारे में
किसी खामख़्याली में उससे पड़ गया होगा एक क़दम गलत
और तुम सब टूट पड़े उस पर बेतहाशा
जिस पर व्यस्त सड़क का कोई आदमी ध्यान नहीं देता
फिर भी हमारे वक्त के नियंताओं के निशाने पर
रहता है जो हर वक़्त
कुत्तो, तुम भी उस पर ध्यान देते हो इतना
कि वह उसे निपट शर्मिंदगी से भिड़ा दे
और यह अहसास ही अपने आप में कर देता है कितना निराश
कि जिसके पीछे पड़ते हैं कुत्ते
वह उसी लायक होता है
...
वाटरलू पर लिखी गई हैं कई कविताएँ
पानीपत पर भी लिखी गई होंगी
कार्ल सैंडबर्ग ने तो एक कविता में
घास से ढाँप दिया था युद्ध का मैदान
यहाँ घास नहीं है, यक़ीनन कार्ल सैंडबर्ग भी नहीं
किसी न किसी को तो दुख होगा इस बात पर
कुछ युद्ध याद रखे जाते हैं लंबे समय तक
कई उत्सव भुला दिए जाते हैं अगली सुबह
मुझे पता नहीं
पुरातत्ववेत्ताओं को इसमें कोई रुचि होगी
कि खोदा जाए यहाँ का कोई टीला
किसी कंकाल को ढूंढ़ा जाए और पूछा जाए जबरन
तुम्हारे जमाने में घी कितने पैसे किलो था
कितने में मिल जाती थी एक तेज़धार तलवार
कुछ लड़ाइयाँ दिखती नहीं
कुछ लोग होते हैं आसपास पर दिखते नहीं
कुछ हथियारों में होती ही नहीं धार
कुछ लोग शक्ल से ही बेहद दब्बू नजर आते हैं
जो लोग मार रहे थे उन्हें नहीं दिखते थे मरने वाले
हुकुम की पट्टियाँ थीं चारों ओर निगल जाती हैं रोशनी को
युद्ध के लिए अब जरूरी नहीं रहे मैदान
गली, नुक्कड़ और मुहल्लों का विस्तार हो गया है
कोई अचरज नहीं
बिल्डिंग के नीचे लोग घूम रहे हों लेकर हथियार
कोई अचरज नहीं
दरवाजा तोड़कर घर में घुस आएँ लोग
कुछ लोग हैं जो जिए जाते हैं
उन्हें नहीं पता होता जिए जाने का मतलब
कुछ लोग हैं जो बिल्कुल नहीं जानते
एक इंसान के लिए मौत का मतलब
घास नहीं ढाँप सकती इस मैदान को
घास भी जानती है
हरियाली पानी से आती है, ख़ून से नहीं
युद्ध का मैदान अब पर्यटनस्थल है
कुछ लोग घर से बनाकर लाते हैं खाना
यहाँ अखबारों पर रख खाते हैं
एक-दूसरे के पीछे दौड़ते हैं बॉल को ठोकर मारते
अंताक्षरी गाते-गाते हँसने लगते हैं
कोई चीख किसी को सुनाई नहीं देती
बच्चे यहाँ झूला झूल रहे हैं
वे देख लेंगे ज़मीन के नीचे झुककर एक बार
यकीनन बीमार पड़ जाएंगे
...
मैं इतना तो नहीं चला कि
मेरे जूते फट जाएँ
मैं चला सिद्धार्थ के शहर से हर्ष के गाँव तक
मैं चंद्रगुप्त अशोक खुसरो और रजिया से ही मिल पाया
मेरे जूतों के निशान
डि´गामा के गोवा और हेमू के पानीपत में हैं
अभी कितनी जगह जाना था मुझे
अभी कितनों से मिलना था
इतना तो नहीं चला कि
मेरे जूते फट जाएँ
मैंने जो नोट दिए थे, वे करकराते कड़क थे
जो जूते तुमने दिए, उनने मुँह खोल दिया इतनी जल्दी
दुकानदार!
यह कैसी दग़ाबाजी है
मैं इस सड़क पर पैदल हूँ और
खुद को अकेला पाता हूँ
अभी तल्लों से अलग हो जाएगा जूते का धड़
और जो मिलेंगे मुझसे
उनसे क्या कहूंगा
कि मैं ऐसी सदी में हूँ
जहाँ दाम चुकाकर भी असल नहीं मिलता
जहाँ तुम्हारे युगों से आसान है व्यापार
जहाँ यूनान का पसीना टपकता है मगध में
और पलक झपकते सोना बन जाता है
जहाँ गालों पर ढोकर लाते हैं हम वेनिस का पानी
उस सदी में ऐसा जूता नहीं
जो इक्कीस दिन भी टिक सके पैरों में साबुत
कि अब साफ़ दिखाने वाले चश्मे बनते हैं
फिर भी कितना मुश्किल है
किसी की आँखों का जल देखना
और छल देखना
कि दिल में छिपा है क्या-क्या यह बता दे
ऐसा कोई उपकरण अब तक नहीं बन पाया
इस सदी में कम से कम मिल गए जूते
अगली सदी में ऐसा होगा कि
दुकानदार दाम भी ले ले
और जूते भी न दे?
फट गए जूतों के साथ एक आदमी
बीच सड़क पैदल
कितनी जल्दी बदल जाता है एक बुत में
कोई मुझसे न पूछे
मैं चलते-चलते ठिठक क्यों गया हूँ
इस लंबी सड़क पर
क़दम-क़दम पर छलका है ख़ून
जिसमें गीलापन नहीं
जो गल्ले पर बैठे सेठ और केबिन में बैठे मैनेजर
के दिल की तरह काला है
जिसे किसी जड़ में नहीं डाला जा सकता
जिससे खाद भी नहीं बना सकते केंचुए
यहाँ कहाँ मिलेगा कोई मोची
जो चार कीलें ही मार दे
कपड़े जो मैंने पहने हैं
ये मेरे भीतर को नहीं ढँक सकते
चमक जो मेरी आँखों में है
उस रोशनी से है जो मेरे भीतर नहीं पहुँचती
पसीना जो बाहर निकलता है
भीतर वह ख़ून है
जूते जो पहने हैं मैंने
असल में वह व्यापार है
अभी अकबर से मिलना था मुझे
और कहना था
कोई रोग हो तो अपने ही ज़माने के हकीम को दिखाना
इस सदी में मत आना
यहाँ खड़िए का चूरन खिला देते हैं चमकती पुर्जी में लपेट
मुझे सैकड़ों साल पुराने एक सम्राट से मिलने जाना है
जिसके बारे में बच्चे पढ़ेंगे स्कूलों में
मैं अपनी सदी का राजदूत
कैसे बैठूंगा उसके दरबार में
कैसे बताऊंगा ठगी की इस सदी के बारे में
जहाँ वह भेस बदलकर आएगा फिर पछताएगा
मैं कैसे कहूंगा रास्ते में मिलने वाले इतिहास से
कि संभलकर जाना
आगे बहुत बड़े ठग खड़े हैं
तुम्हें उल्टा लटका देंगे तुम्हारे ही रोपे किसी पेड़ पर
मैं मसीहा नहीं जो नंगे पैर चल लूँ
इन पथरीली सड़कों पर
मैं एक मामूली, बहुत मामूली इंसान हूँ
इंसानियत के हक़ में खामोश
मैं एक सज़ायाफ़्ता कवि हूँ
अबोध होने का दोषी
चौबीसों घंटे फाँसी के तख़्त पर खड़ा
एक वस्तु हूँ
एक खोई हुई चीख़
मजमे में बदल गया एक रुदन हूँ
मेरे फटे जूतों पर न हँसा जाए
मैं दोनों हाथ ऊपर उठाता हूँ
इसे प्रार्थना भले समझ लें
बिल्कुल
समर्पण का संकेत नहीं
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मराठी कवि स्व. भुजंग मेश्राम के लिए
पीड़ाओं का विकेंद्रीकरण हो रहा है और दुख का निजीकरण
दर्द सीने में होता है तो महसूस होता है दिमाग में
दिमाग से उतरता है तो सनसनाने लगता है शरीर
प्रेम के मक़बरे जो बनाए गए हैं वहाँ बैठ प्रेम की इजाज़त नहीं
पुरातत्वविदों का हुनर वहाँ बौखलाया है
रेडियोकार्बन व्यस्त हैं उम्रों की शुमारी में
सभ्यताओं ने इतिहास को काँख में चाँप रखा है
आने वाले दिनों के भले-बुरेपन पर बहस तो होती ही है
मरे हुए दिनों की शक्लोसूरत पर दंगल है
तीन हज़ार साल पहले की घटना तय करेगी
किसे हक़ है यह ज़मीन और किसके तर्क बेमानी हैं
कौन मज़बूर है कौन गाफ़िल
किसने युद्ध लड़ा आकाश में कौन मरा मुंबै में
बरसों सोच किसने मुँह से निकाले कुछ लफ़्ज़
एक साथ एक अरब लोगों की रुलाहट के बाद उसके
कानों पर वह कौन-सी जूँ है जिसे बेडि़याँ बंधीं
किन किसानों ने कीं खुदकुशियाँ
वी.टी. की एक इमारत ने किया लोगों को रातो-रात ख़ुशहाल
कितने कंगाल हुए भटक गए
हरे पेड़ों की तरह जला दिए गए लोग
जबरन माथे पर खोदे गए कुछ चिह्न
तुलसी के पौधों पर लटके बेरहम साँपों की फुफकार
लाचार घासों को डसने का शगल
इस तरफ़ कुछ लोग आए हैं जो बड़े प्रतीकों-बिंबों में बात करते हैं
इसकी मज़बूरी और मतलब
मालूम नहीं पड़ता
बताओ, दिल पर नहीं चलेंगे नश्तर तो कहां चलेंगे
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रात में हम ढेर सारे सपने देखते हैं
सुबह उठकर हाथ-मुँह धोने से पहले ही भूल जाते हैं
हमारे सपनों का क्या हुआ यह बात हमें ज्यादा परेशान नहीं करती
हम कहने लगे हैं कि हमें अब सपने नहीं आते
हमारी गफ़लत की अब उम्र होती जा रही है
हम धीमी गति से सड़क पार करते बूढ़े को देखते हैं
हम जितनी बार दुख प्रकट करते हैं
हमारे भीतर का बुद्ध दग़ाबाज होता जाता है
मद्धिम तरीके से सुनते हैं नवब्याही महिला सहकर्मी से ठिठोली
जब पता चलता है
शादी के बाद वह रिश्वत लेने लगी है
हमारे भीतर एक मूर्ति के चटखने की दास्तान चलती है
वे कौन-सी चीज़ें हैं, जिनने हमें नज़रबंद कर लिया है
हम झुटपुटे में रहते हैं और अचरज करते हैं
अंधेरे और रोशनी में कैसा गठजोड़ है
हमारे खंडहरों की मेहराबों पर आ-आ बैठती है भुखमरी
हमारे तहखानों से बाहर नहीं निकल पाती छटपटाहट
पानी से भरी बोतल में जड़ें फैलाता मनीप्लांट है हमारी उम्मीद
हम सबके पैदा होने का तरीका एक ही है
हम सब अद्वितीय तरीकों से मारे जाएंगे, तय नहीं
कौन-सी इंटीग्रेटेड चिप है जो छिटक गई है दिमाग से
क्या हमारे जोड़ों को ग्रीस की जरूरत है?
अपनी उदासी मिटाने के लिए हममें से कई के शहरों में
होता है कोई पुराना बेनूर मंदिर, नदी का तट
समुद्र का फेनिल किनारा या पार्क की निस्तब्ध बेंच
या घर में ही उदासी से डूबा कोई कमरा होता है अलग-थलग
जिसकी बत्तियाँ बुझा हम धीरे-धीरे जुदा होते हैं जिस्म से
हम पलक झपकते ही दुनिया के किसी भी
हिस्से में साध सकते हैं संपर्क
तुर्रा यह कि कहा जाता है इससे विकराल असंवाद पहले नहीं रहा
कुछ लोगों को शौक है
बार-बार इतिहास में जाने का
दूध और दही की नदियों में तैरने का
उन्हें नहीं पता दूध के भाव अब क्या हो रहे हैं
वे हमारी पशुता पर खीझते हैं
उन्हें बता दूँ ये बेबसी
हमारे लिए सिर्फ गोलियाँ बनी हैं
बंदूक की
और दवाओं की
फिर भी वह कौन-सी ख़ुशी है जो हमारे भीतर है अभी भी
कि हर शाम हम मुस्कराते हैं
अपने बच्चों को खिलाते हैं और दरवाज़ा बंद कर सो जाते हैं
कुछ आड़ी-तिरछी लकीरों और मुर्दुस रंगों वाले
मॉडर्न आर्ट सरीखे अबूझ चेहरों पर नाचता है मसान का दुख
चिता
...
कोशिश करता हूँ किसी भी अभिव्यक्ति से
किसी को भी ठेस न पहुंचे
जिस पेशे में हूँ मैं
वहां किसी गुनाह की तरह
कठिन शब्दों को छाँट देता हूँ
कठिन वाक्यों को बना देता हूँ सरल
जबकि हालात दिन-ब-दिन और कठिन होते जाते
मैं समय का संपादन नहीं कर पाता
कितना खुशकिस्मत हूँ
एक जीवन में कितनी स्त्रियों का प्रेम मिला
कितने मित्रों कितने बच्चों का
प्रेम के हर पल में जन्म लेता हूँ
पल-बढ़कर प्रेम की ही किसी आदिम गुफा में
छिप जाता हूँ धीरे-धीरे मृत होता
कंधे झिड़क कहता हूँ ख़ुद से
एक जीवन और चाहिए पाया हुआ प्रेम लौटने को
घृणा की वर्तनी में कोई ग़लती नहीं होती मुझसे
नफ़रत में नुक्ता लगाना कभी नहीं भूलता
...
तुम इतनी देर तक घूरते रहे अंधेरे को
कि तुम्हारी पुतलियों का रंग काला हो गया
किताबों को ओढा इस तरह
कि शरीर कागज़ हो गया
कहते रहे मौत आए तो इस तरह
जैसे पानी को आती है
वह बदल जाता है भाप में
आती है पेड़ को
वह दरवाज़ा बन जाता है
जैसे आती है आग को
वह राख बन जाती है
तुम गाय का थान बन जाना
दूध बनकर बरसना
भाप बनकर चलाना बड़े-बड़े इंजन
भात पकाना
जिस रास्ते को हमेशा बंद रहने का शाप मिला
उस पर दरवाज़ा बनकर खुलना
राख से मांजना बीमार माँ की पलंग के नीचे रखे बासन
तुम एक तीली जलाना
उसे देर तक घूरना
...
उसकी कहानी में कोई भी आ सकता है
पर उसका जाना वह ख़ुद तय करती है
गुड़ियों से खेलती है क्ले से फूल बनाती है
ज़्यादातर समय आप उसे कंप्यूटर पर या काग़ज़ पर
चित्र बनाते या रंग भरते देख सकते हैं
उसकी साँस से फूलती है उसकी कहानी।
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Geet Chaturvedi (Hindi: गीत चतुर्वेदी) is a well-known Hindi poet, short story author and journalist. He was awarded the prestigious Bharat Bhooshan Award for poetry in 2007. Biography Geet was born on 27 November 1977 in Mumbai, Maharashtra. He lives in Bhopal, India. He is one of the few writers of his generation who is skillful in both verse and prose- both as a fiction writer and critic. He has been named one of the 'Ten Best Writers' of India by esteemed English daily The Indian Express. Geet Chaturvedi is the author of five books including two translations of Pablo Neruda and Charlie Chaplin. He published three books in 2010, a book of poetry Aalaap mein girah, and two collections of stories Savant Auntie ki Larkiyan and Pink Slip Daddy. His stories are quite longer in their length and he insists to call them novella, as he says in an interview, there is no synonym for longer short stories in Hindi and novella is the best word to name this form of writing. His stories Savant Auntie ki Larkiyan, Sahib Hai Rangrez and Gomootra are widely talked about. His novella Pink Slip Daddy (2009) was considered as one of the best works of fiction in recent year's Hindi writing by noted literary periodical Kathadesh. Once wanted to be a rockstar, Geet Chaturvedi is deeply influenced by world literature, world cinema and western classical music. He is a Post-Modern writer and his major themes are alienation, homogenization, betrayal in love and corporate life, emotions of economic under-development and life in the provincial landscapes of Mumbai. His hometown Mumbai, often, comes as a character rather than a city, like the novels of Orhan Pamuk. His prose and poetry are distinct combination of eastern and western world. It makes him to be considered as one of the few truly urban writers of Hindi. His major influences are Veda Vyasa, Shankaracharya, Homer, Kalidasa, Dante along with the post-modern giants of twentieth century like Jorge Luis Borges, Gabriel Garcia Marquez and Orhan Pamuk. In an interview, Geet says, "(After reading Borges and Shankaracharya) I find that a writer lives in the 25th hour of the watch. This is not independent of the 24 hours (of a day). It's (about) residing in the absent. When you do so, you participate in all other presences of the cosmos." Professional Life He employs multi-layered narratives into his fiction and looks at the cinema to get his creative fodders. He uses cinematic techniques of master filmmakers in his fiction. Krzysztof Kieslowski, for instance, tell him how a frame can swiftly carry a couple of overlapping or independent tales, the secondary characters emerging as primary ones in the next. While he can appreciate Finnish filmmaker Aki Kaurismaki's minimalism, his fiction weaves a complex structure of incidents and characters. His long poem Ubhaychar (The amphibian), published in 2010, is also taken as one of his major achievements. Awards Chaturvedi was awarded the Bharat Bhushan Agrawal Award in 2007 for his poem Mother India appeared in the October 2006 issue of journal Vagarth. His poetry has been translated into more than eight languages. Many senior writers and literary journals consider him one of the best writers in India. Legendary critic Namvar Singh has named him as one of the best poets and novelists of the first decade of the 21st century. While internationally acclaimed poet-critic Ashok Vajpai, in an interview, says, "Geet Chaturvedi has shown a truly avant-garde spirit in his fiction and poetry. He brings his vast reading, unusual for his generation, to bear effortlessly on his writing, which is innovative in language and style. He has an evolving vision, which is not bogged down by cliches or clutches of current ideological stances.")
The Memory of Now
(For Eduardo Chirinos)
Downstairs I left a candle burning
In its light I'll read a few lines when I return
By the time I returned the candle had burned out
Those few lines had faded like innocence
You walk with me
The way moon walks along with a child sitting in a train window
I stood in the balcony one day
Waved a handkerchief toward the sky
Those who have gone without saying their goodbyes
Will recognize it even from far
In my handkerchief they have left behind their tears
The way early humans left behind their etchings on cave walls
Lyotard said, every sentence is a now
No. Actually it's a memory of now
Every memory is a poem
In our books, the count of the unwritten poems is so much more
Today, I have read a poem written by Geet Chaturvedi and have already become his fan. I hope to read all his poems in the days to come. I am enamored by his simple style and feel with which he develops the theme. Thanks and Good Wishes to this gifted poet.
आपका परिचय पढ़ते हुये मुझे याद आया कि मैं हिंदी की कई पत्रिकाओं में आपकी कवितायें पहले भी पढ़ चुका हूँ. धन्यवाद.