(For Eduardo Chirinos)
Downstairs I left a candle burning
In its light I'll read a few lines when I return
By the time I returned the candle had burned out
Those few lines had faded like innocence
You walk with me
The way moon walks along with a child sitting in a train window
I stood in the balcony one day
Waved a handkerchief toward the sky
Those who have gone without saying their goodbyes
Will recognize it even from far
In my handkerchief they have left behind their tears
The way early humans left behind their etchings on cave walls
Lyotard said, every sentence is a now
No. Actually it's a memory of now
Every memory is a poem
In our books, the count of the unwritten poems is so much more
...
Once upon a time, there was a Seed. It had an Earth. They both loved each other. The Seed rollicked and rolled in the lap of the Earth, and wanted to remain there forever. The Earth kept it secure within her arms and would repeatedly urge it to sprout. The Seed was reluctant. The Earth thirsted in fecund heat. One day, it rained and the Seed could not defer its sprouting. Half-heartedly, it put forth shoots and soon thereafter became delightfully absorbed in growing. Mental abstraction is a delightful idyll too. It grew a good deal and rose to a great height. The earth does not grow in height but spreads out. Much as a tree may expand by spreading out, its upward growth is its identity.
They both grew apart. The roots stayed in the ground, so to speak, but to date, who has ever regarded roots as trees? A tree is that which furthers itself away from the earth. If it remained glued, it would be grass. The Tree wishes to go back being a Seed again. The Earth wishes to take back her blessing. It saddens the Tree that it can never again become that single Seed. However, it would certainly turn into a thousand seeds. The Earth would never be able to feel the soft touch of that very same Seed. For her, the Tree would merely be a shadow.
Every single thing in life does not have an obverse to it. Night is not a dark Day, and Day is not a bright Night. Moon not a cold Sun, and Sun not a hot Moon. The Earth and the Sky meet nowhere. Nowhere at all.
I go and stand very near the Tree and whisper, You hear me, you are Seed even now. That very same Seed. Don't let height intoxicate you. Even now you are not grown. You are merely Earth's imagination.
All trees grow in imagination. In memory, they always remain seeds.
...
एक पीली खिड़की इस तरह खुलती है
जैसे खुल रही हों किसी फूल की पंखुड़ियां.
एक चिड़िया पिंजरे की सलाखों को ऐसे कुतरती है
जैसे चुग रही हो अपने ही खेत में धान की बालियां.
मेरे कुछ सपने अब सूख गए हैं
इन दिनों उनसे अलाव जलाता हूं
और जो सपने हरे हैं
उन्हें बटोरकर एक बकरी की भूख मिटाता हूं
मेरी भाषा का सबसे बूढ़ा कवि लाइब्रेरी से लाया है मोटी किताबें
चौराहे पर बैठ सोने की अशर्फि़यों की तरह बांटता है शब्द
मेरे पड़ोस की बुढ़िया ने ईजाद किया है एक यंत्र जिसमें आंसू डालो, तो
पीने लायक़ पानी अलग हो जाता है, खाने लायक़ नमक अलग.
एक मां इतने ममत्व से देखती है अपनी संतान को
कि उसके दूध की धार से बहने लगती हैं कई नदियां
जो धरती पर बिखरे रक्त के गहरे लाल रंग को
प्रेम के हल्के गुलाबी रंग में बदल देती हैं.
...
This is one of the rhymes
Taught in Shri Guru Gobind Singh Hindi Primary School
One of the quavering anthems of olden days sung by those
Now addressed as ma-baba-grandma
It is someone's idea of fun or pastime, rhythm-non-rhythm-marching-rhythm
Oh look, the vermilion-anointed forehead of the Queen is still the same
Or to all of history it shows the power of the power game.
This is the broad formula of Eastern metaphysics -
That everyone has to die one day.
Oops! In the rhyme-story invoked at the end,
No one among the three died dawdling, they died
Doing their work, hup ho! they died fighting their war, bravo!
Why isn't there a word like martyr for them - bearing such a placard
Was the man who just passed by me, named
Swami Varg-Chaitanya Kirti-Akankshi 1008¹
Like our tribal poet, Bhujang Meshram²
I too had asked innocently
About Sivakasi³ the city that makes firecrackers -
Why doesn't its childhood ever go away?
The less the IQ, the better the poem would be; life too.
I say, wherever you have to live, take retirement from there;
In so doing, you'd derive the pleasure of a duplex house :-)
Dear me, no!
This is not a classroom struggle between Class 1-A and 1-B
This struggle is intricate, as cryptic as my class-map.
To present anything the way it is, would be against our customs
So the way I've come to office in my Bermudas and t-shirt
(I warned you this would happen)
The same way in this preshentation I päshte
A moving song of my middle class, read carefully:
The King died in the war he fought
The Queen died in the cooking pot
The Children died studying a lot . . .
...
चारों तरफ़ बिखरे हैं काग़ज़
एक काग़ज़ पर है किसी ज़माने का गीत
एक पर घोड़ा, थोड़ी हरी घास
एक पर प्रेम
एक काग़ज़ पर नामकरण का न्यौता था
एक पर शोक
एक पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था क़त्ल
एक ऐसी हालत में था कि
उस पर लिखा पढ़ा नहीं जा सकता
एक पर फ़ोन नंबर लिखे थे
पर उनके नाम नहीं थे
एक ठसाठस भरा था शब्दों से
एक पर पोंकती हुई क़लम के धब्बे थे
एक पर उँगलियों की मैल
एक ने अब भी अपनी तहों में समोसे की गंध दाब रखी थी
एक काग़ज़ को तहकर किसी ने हवाई जहाज़ बनाया था
एक नाव बनने के इंतज़ार में था
एक अपने पीलेपन से मूल्यवान था
एक अपनी सफ़ेदी से
एक को हरा पत्ता कहा जाता था
एक काग़ज़ बार-बार उठकर आता
चाहते हुए कि उसके हाशिए पर कुछ लिखा जाए
एक काग़ज़ कल आएगा
और इन सबके बीच रहने लगेगा
और इनमें कभी झगड़ा नहीं होगा
...
कविता को उपयोगितावादी दृष्टिकोण से देखना मुझे नहीं पसन्द।
फिर भी मन में कई बार आता है ख़याल
कि कोई मानव-बम
बटन दबाना भूल जाए
कि उस समय वह कविता पढ़ रहा था
उसके बाद अपना बम उतार कर
ख़ुद एक मानव-कविता बन जाए
ताकि दूसरे बम उसे पढ़ सकें।
...
फूल चढ़ाने के बाद उस लाश को घेरकर हम खड़े हो गए थे।
सम्मान से सिर झुकाए. उसका चेहरा निहारते।
हममें से कई को लगा कि पल-भर को लाश के होंठ हिले थे।
हाँ, हममें से कई को लगा था वैसा, पर हम चुप थे।
एक ने उसके नथुनों के पास उँगली रखकर जाँच भी लिया था।
उसके दाह के हफ़्तों बाद तक लोगों में चर्चा थी कि
मरने के बाद भी उस लाश के होंठ पल-भर को हिले थे।
कैफ़े चलाने वाली एक बुढि़या, जो रिश्ते में उसकी कुछ नहीं लगती थी,
बिना किसी भावुकता के उसने एक रोज़ मुझसे कहा,
मुझे विश्वास था, वह आएगा, मरने के बाद भी आएगा
अपना अधूरा चुम्बन पूरा करने।
53 साल पहले जब वह 17 का था
गली के पीछे टूटे बल्ब वाले लैम्पपोस्ट के नीचे
एक लड़की का चुम्बन अधूरा छोड़कर भाग गया था।
...
अगर तुम एक देश बनाते, तो वह एक मौन देश होता : तुम्हारे रचे शब्दकोश मौन होते : तुमने कभी देवताओं के आगे हाथ नहीं जोड़ा : ताउम्र तुम एक दृश्य रचते रहे : उनमें तुम मानसिक आँसुओं की तरह अदृश्य रहे
अर्थ की हर तलाश अन्तत: एक व्यर्थ है : इस धरती पर जितने बुद्ध, जितने मसीहा आए, इस व्यर्थ को कुछ नए शब्दों में अभिव्यक्त कर गए : माँ की तरफ़ से मैं पीड़ा का वंशज हूँ : पिता की तरफ़ से अकेलेपन का : जब भी मैं घर की दहलीज़ लाँघता हूँ : मैं एकान्त का इतिहास लाँघता हूँ
गुप्त प्रेमी मरकर कहाँ जाते हैं?
सड़क की तरफ़ खुलने वाली तुम्हारी खिड़की के सामने
लगे खम्भे पर बल्ब बनकर चमकते हैं
उनके मर चुकने की ख़बर भी बहुत-बहुत दिनों तक
नहीं मिल पाती
मृत्यु का स्मरण
तमाम अनैक्य का शमन करता है
मेरी आँखें मेरे घुटनों में लगी हैं
मैंने जीवन को हमेशा
विनम्रता से झुककर देखा
थके क़दमों से एक बूढ़ा सड़क पर चला जा रहा
वह विघटित है
उसके विघटन का कोई अतीत मुझे नहीं पता
मैं उसके चलने की शैली को देख
उसके अतीत के विघटन की कल्पना करता हूँ
वह अपनी सज़ा काट चुका है
कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि जज साहब उसे
बाइज़्ज़त बरी कर दें
जो कहते हैं भविष्य दिखता नहीं, मैं उन पर यक़ीन नहीं करता
मैं अपने भविष्यों को सड़कों पर भटकता देखता हूँ
उसी तरह मेरे भविष्य
मुझे देख अपना
अतीत जान लेते हैं
मैं वह शहर हूँ जिसकी वर्तनी व उच्चारण
बार-बार बदल देता
एक ताक़तवर राजा
यह मेरी देह का भूगोल है :
मैं आईने के सामने जब भी निर्वस्त्र खड़ा होता हूँ,
मुझे लगता है,
मैं एक भौगोलिक असफलता हूँ
...
शहर के बाहर पुल के नीचे कचरे के ढेर के बीचोंबीच
मेरी भाषा का सबसे बूढ़ा कवि चाय में डबलरोटी डुबोकर खाता है
उसने अफ़ज़़ाल से भी पहले शायरी ईजाद की थी
सारे देवता जूँ बनकर उसकी दाढ़ी में रहते हैं
उसके शरीर पर जितने बाल हैं, वे उसकी अनलिखी कविताएँ हैं
वह उँगलियों से हवा में शब्द उकेरता है
इस तरह, हर रात अपने अतीत को लिखता है एक चिट्ठी
जो लिफ़ाफ़ा खोजने से पहले ही खो जाती है
मरने से पहले एक बार
कम से कम एक बार
उस औरत का सही नाम और चेहरा याद करना चाहता है
जो किसी ज़माने में उसकी कविताओं की किताब
अपने तकिए के नीचे दबाकर सोती थी
...
बहुत सारी रातें मैंने काम करके बिताई हैं
लिखते हुए, पढ़ते हुए.
हमेशा अकेला ही रहा, इसलिए महज़ ख़ुद से लड़ते हुए.
लेकिन मैं याद करता हूँ उन रातों को
जब मैंने कुछ नहीं किया, पैरों को मेज़ पर फैलाकर बैठा
दीवार पर बैठे मच्छर को बौद्ध-दर्शन की किताब से दबा दिया.
काँच के गिलास को उँगलियों से खिसकाकर फ़र्श पर गिरा दिया,
महज़ यह जानने के लिए कि
चीज़ों के टूटने में भी संगीत होता है।
एक रात बरामदे में झाड़ू लगाया और उसी बहाने आधी सड़क भी साफ़ कर दी
किताबों से धूल हटाने की कोशिश की तो जाना-
साहित्य और धूल में वर-वधू का नाता है.
बाक़सम, इस बात ने मुझे थोड़ा विनम्र बनाया.
मैंने धूल को साहित्य और साहित्य को धूल जितना सम्मान देना सीखा।
कुछ गोपनीय अपराध किए
तीस साल पुरानी एक लड़की को फेसबुक पर खोजता रहा
और जाना कि पुरानी लड़कियां ऐसे नहीं मिलतीं -
शादी के बाद वे अपना नाम-सरनेम बदल लेती हैं।
सीटी बजाते हुए सड़कों पर तफ़रीह की
और एक बूढ़े चौकीदार के साथ सूखी टहनियां तलाशीं
ताकि वह अलाव ताप सके।
एक रात जब सिगरेट ख़त्म हो गई तब बड़ी मेहनत से ढूँढ़ा उस चौकीदार को.
उसने मुझे पहचान लिया और अपनी बीड़ी का आधा बण्डल मुझे थमा दिया।
एक औरत से मैंने सिर्फ़ एक वक़्त की रोटी का वादा किया था
जवाब में दूसरे वक़्त भूखी रहती थी वह.
आधी रात मैं उसे कार में बिठाता और शहर से बहुत दूर ढाबे में ले जाता.
वह आधी अंगड़ाई जितनी थी, आधी रोटी जितनी, आधी खुली खिड़की जितनी,
आधे लगे नारे जितनी.
खाना खाने के बाद हम प्रॉपर्टी के रेट्स पर बहसें करते
और मिट्टी पर मण्टो का नाम लिखते थे.
एक रात एक पुलिसवाले ने मुझे ज़ोर से डाँटा कि क्यों घूम रहा है इतनी रात को?
मैंने भी उसे चमका दिया कि लोग मुझे हिन्दी का बड़ा कवि मानते हैं, तुम ऐसे मुझे डाँट नहीं सकते।
बिफरकर वह बोला, साले, चार डण्डे मारूँगा तेरे पिछवाड़े. घर जाकर सो जा.
मैंने उसके साथ बैठकर तीन सिगरेटें पीं. वह इस बात से परेशान था
कि उसका साहब एक नम्बर का चमड़ी है
और वह अपनी बेटी को पुलिस में नहीं आने देगा.
अपनी मोटरसाइकिल पर बिठाकर मुझे घर छोड़ गया।
एक रात जब मैं पैदल भटक रहा था, कुछ कुत्ते भौंकने लगे मुझ पर।
मैंने दस्तायेव्स्की का एक हार्ड-बाउण्ड मोटा उपन्यास उन्हें दे मारा.
पर कुछ पल बाद ही कुत्ते फिर से भौंकने लगे.
मैंने इसे फ़्योदर की एक और नाकामी मानी
और मन ही मन सोचा :
यह दुनिया माईला... नाम्या ढसाळ का गाण्डूबगीचा है।
जिन रातों को मैंने मोटी-मोटी किताबें पढ़ीं,
कुछ कवियों को सराहा, कई पर नाक-भौं सिकोड़ी,
जिन रातों को बैठकर मैंने अपनी कविताएँ सुधारीं, गद्य लिखे -
मैं उन रातों को कभी याद नहीं करता
न ही वे चीज़ें याद आती हैं जो मैंने लिखी हैं -
वे बेशक भूल जाने लायक़ हैं.
पर जो चीज़ मैं नहीं भूल पाता, वह है अपनी रातों की आवारगी.
न पैसा न दमड़ी, न किताब न कविता
जब मरूँगा, छाती से बाँध के ले जाऊँगा ये अपनी आवारगी।
और हाँ, जाने कितनी रातें मैंने छत पर गुज़ारी हैं.
कभी रेलिंग से टिककर धुआँ उड़ाते. कभी नंगी फ़र्श पर चित लेटे
आकाश निहारते.
ख़ुद से कहा है बारहा - लोग तुम्हें कितना भी रूमानी कहें गीत चतुर्वेदी
आँसू, गुलाब और सितारे से कभी बेवफ़ाई मत करना.
कविता ख़राब बन जाए, वान्दा नहीं
पर दिल को इन्हीं तीनों से माँजना - हमेशा साफ़ रहेगा.
अंतत: ख़ुद कवि को ही करनी होती है
अपनी बेचैनियों की हिफ़ाज़त।
कविता की शीर्षक मोहसिन अली नक़वी की एक ग़ज़ल की एक पंक्ति है
गाण्डूबगीचा' मराठी कवि नामदेव ढसाळ के एक कविता-संग्रह का नाम है
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