sanjay kumar maurya

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तुम थी ही नहीं - Poem by sanjay kumar maurya

मुद्दतों तुमसे अठखेलियां करता रहा
लिपट दामन से तेरे आह मैं भरता रहा
था प्रेम में तेरे जीता और मरता रहा
पर नींद से जागा तो तुम थी ही नहीं
तुम थी ही नहीं
तुम थी ही नहीं

लगने लगा यहीं पर तुम कहीं से आ गई हो
अपनी दस्तक हमारे इर्द गिर्द बिखरा गई हो
आतुर हुआ उठकर जब एक दीद की खातिर
किवाड़ जब खोला झटककर तुम थी ही नहीं
तुम थी ही नहीं
तुम थी ही नहीं
किताबों में ढूढ़ा तुझे ख्यालोें में ढूढ़ा तुझको
जबाबों में ढूढ़ा तुझे सवालों में ढूढ़ा तुझको
न जाने कौन सी दुनियां जहां पे खो गई हो
अब लगता यही कि हमनवा तुम थी ही नहीं
तुम थी ही नहीं
तुम थी हि नहीं


जफा मंाझी का हो तो किनारा मिल नहीं सकता
घर अपना नहीं हो तो गुजारा मिल नहीं सकता
अपने ही सातीर हो फिर गैरों का क्या कहना
राह में था मैं अकेला हमसफर तुम थी ही नहीं
तुम थी ही नहीं
तुम थी ही नहीं
तुमसे मुझे यादें मिली तड़पन मिली थी बस
उम्र भर की कांट की उलझन मिली थी बस
खुशियों में तुम्हे पाने की कोशिश लाख की
एक गम के सिवा और कुछ तुम थी नही
तुम थी ही नहीं
तुम थी ही नहीं

Topic(s) of this poem: love


Comments about तुम थी ही नहीं by sanjay kumar maurya

  • Gajanan Mishra (9/2/2015 6:27:00 AM)


    gam ke siva aur kichh thi nehin, beautiful.. (Report) Reply

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Poem Submitted: Wednesday, September 2, 2015



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