Suhail Kakorvi

Bronze Star - 2,766 Points (Lucknow)

ग़ज़ल - Poem by Suhail Kakorvi

बेचैन वो रहता है मेरे पास से जाके
देखा है कई बार मुझे उसने भुला के
आने से तेरे रंग बदल देगी तमन्ना
अल्फ़ाज़ बदल जायेंगे अये दोस्त दुआ के
ये बर्क़ ये गुल और चमकते हुए तारे
सब जलवे हैं ये आपके हंसने की अदा के
मैंने भी बताया कि मेरा हौसला क्या है
तेवर तो बहोत तेज़ थे तूफाने बला के
ज़ाहिर हुए जब राजे मोहब्बत तो खलिश क्या
जाता है तो जाये कोई दामन को छुड़ा के
हम क़ूवते परवाज़ में सानी नहीं रखते
तोड़े हैं जो दर बंद थे हमने ही खला के
ये मान लिया हम तो हैं नाकामे मोहब्बत
तुम और किसी से भी दिखाओ तो निभा के
बेबाक निगाहों में मेरी ऐसी कशिश थी
वो भूल गए आज तो अंदाज़ हया के
उन आँखों में आंसू थे मेरा हाल जो देखा
मंज़िल ने क़दम चूम लिए अबलपा के
वो रोज़ सुहैल एक नई छेड़ करे है

अलफाज़= शब्द, बर्क़ =बिजली, खलिश =बेचैनी, क़ूवते परवाज़ =उड़ने की ताक़त, सानी=दूसरा, खला =स्पेस, बेबाक =बेझिझक, कशिश =आक्रषण, आबलापा, जिसके पाओं में छाले हों,

Topic(s) of this poem: love

Form: Ghazal


Comments about ग़ज़ल by Suhail Kakorvi

  • Rajnish Manga (10/27/2015 11:47:00 AM)


    बहुत बहुत शुक्रिया, जनाब सुहैल साहब. यह एक बेहतरीन ग़ज़ल है जो दुनिया-ए-मुहब्बत के न जाने कितने ही अनदेखे वर्क उजागर कर देती है. 'हम क़ूवते परवाज़ में सानी नहीं रखते / तोड़े हैं जो दर बंद थे हमने ही खला के' (Report) Reply

    0 person liked.
    0 person did not like.
Read all 1 comments »



Read this poem in other languages

This poem has not been translated into any other language yet.

I would like to translate this poem »

word flags


Poem Submitted: Tuesday, October 27, 2015



[Report Error]