Hasmukh Amathalal

Gold Star - 422,083 Points (17/05/1947 / Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India)

मेरी अँखियाँ - Poem by Hasmukh Amathalal

मेरी अँखियाँ

मेरी अँखियाँ तुझी को ढूंढे
पता नही, कहाँ कहाँ खोजे
ना देख पायेतो, हो जाए बहावरी
बढ़ा दे दिल में बहुत इंतजारी।

पता नहीं ये रोग, कहां से लग गया
जो नहीं चाहा था दिल ने, पता आज लग ही गया
ना कोइ मर्ज या इलाज है
बस रेह्ता सिर्फ गमे मिजाज ही है

तुम चाहो तो मौसम बदल सकता है
बाकि प्रेम यहां सरासर बिकता है
कोई किसी का मददगार होता नहीं
पर प्यारमे भी रात को, क्यों सोता नहीं?

में निकालुंगा नहीं लब्ज तेरे शान के खिलाफ
चाहे मुखे धोखा मिले और ना मिले इन्साफ
दिल को मैंने सजा रखा है रौशनी के साथ
बस अब तो एक ही है, मांगना आपका हाथ

अब तो सूरज भी ढल चुका है
फिर भी दिल मुस्कुरा रहा है
मुझे आप के आने का अन्सार मिल चुका है
दिल गुले बहार का आश्का हो गया है

Topic(s) of this poem: poem


Comments about मेरी अँखियाँ by Hasmukh Amathalal

  • Mehta Hasmukh Amathalal (1/15/2016 8:51:00 AM)


    welcome Dinesh Tiwari and Satish Saxena Shunya like this.
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  • Mehta Hasmukh Amathalal (1/15/2016 8:40:00 AM)


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    welcome neelam hasteer n akvi sanyam
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  • Mehta Hasmukh Amathalal (1/15/2016 8:38:00 AM)


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    welcome manpreetbrar, manjinderuppal n vinod chaudhary
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  • Mehta Hasmukh Amathalal (1/15/2016 8:32:00 AM)


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Poem Submitted: Friday, January 15, 2016



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