Priya Guru


डूबा हूँ अब तक - Poem by Priya Guru

सागर के किनारे बांधे बस डूबा हूँ अब तक
कौन मयस्सर यूं कौन मुस्सरत हुआ है अब तक
नूर से मिलाया था तोह कभी खुदी को भुलाया मैने
आसमां में बैठकर तुझे ढूढ़ा है ज़मीं पे अब तक

Topic(s) of this poem: longing


Comments about डूबा हूँ अब तक by Priya Guru

  • Rajnish Manga (1/12/2016 5:59:00 AM)


    आपकी इन कविताओं में आने वाले दिनों की परिपक्वता है. पढ़ कर मन को ख़ुशी मिलती है. धन्यवाद एवम् शुभकामनायें. (Report) Reply

    Nkr Jgr Nkr Jgr (1/12/2016 9:47:00 AM)

    Dhanyavad.. :)

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Poem Submitted: Tuesday, January 12, 2016



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