Upendra Singh 'suman'

Bronze Star - 2,988 Points (03-06-1972 / Azamgarh)

प्यार का कबूलनामा - Poem by Upendra Singh 'suman'

एक रोज दिनदहाड़े
बुद्धा गार्डेन जानेवाली सड़क पर
प्यार मुझसे टकरा गया.
एक अरसे से मैं उस लफंगे की तलाश में था,
हरामखोर रंगेहाथ धरा गया.
मौके पर देख मेरा रूख़ कुछ कड़ा,
प्यार मुझसे थोड़ा अकड़ा.
इस पर मैंने उसे हड़काया -
अबे रूक तूं आया है बड़ा.
उसे बुरी तरह डांटा,
और खींच के दिया एक चाटा.
उसके प्रति मैं क्रोध से इतना भरा था
कि -
मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ा था.
मैंने आव देखा न ताव उसे फौरन ललकारा
और जबर्दस्त धोबियापाट दे मारा.
उसे अपनी भुजाओं में जमकर जकड़ा
और उसका गिरेबान धर पकड़ा.
जब वो अपनी औकात की थाह पा गया
और पूरी तरह से मेरे काबू में आ गया,
तो मैंने उसे फटकारते हुए पूछा -
क्यों बे, नीच, भगोड़ा
शरीफों की राह का रोड़ा.
बेशर्म, बदमिज़ाज,
कोढ़ की खाज,
बदजात, खूनी, हत्यारा,
आले दर्जे का आवारा.
तूं लोगों को फुसलाता है, बहलाता है,
और उन्हें अपने जाल में फंसाता है.
प्यार के नाम पर तूं न जाने क्या-क्या कर रहा है.
आम आदमी की ख़ास ज़िन्दगी में ज़हर भर रहा है.
तूं राह चलती बहन-बेटियों से करता है हंसी-ठट्टा.
क्यों बे हरामखोर, उल्लू का पट्ठा.
अरे, भूतनी के, और तो और
अब तो,
तूं समलैंगिकों के बीच फेरे डलवा रहा है,
अबे बेहया, बदतमीज, कुत्ते की जात,
ये सब क्या करवा रहा है? ? ?
प्यार अपने प्रति मेरा रवैया देख घबरा गया,
और आसमान से जमीन पर आ गया.
उसने मिमियाते हुए अपना मुँह खोला
और अपनी सफाई देते हुए बोला -
मैं तो वो प्यार हूँ जो दूरियां मिटाता है.
दिल से दिल को मिलाता है.
संबंधों को जोड़ता है.
बातचीत के बंद दरवाजे खोलता है.......
श्रीमान, लगता है आपको किसी ने गुमराह किया है.
प्यार की आड़ में बुरी तरह तबाह किया है.
उसका खामियाज़ा मुझे भुगतना पड़ रहा है,
मेरे जैसे नेक पुरूष को देखकर
आप का पारा बेवजह चढ़ रहा है.
बातें बनाते देख मैंने प्यार को एक बार फिर फटकारा -
चुप कर पापी, गुंडा, चोर, नकारा.
भोले-भाले इंसानों की इज्जत का लुटेरा.
नीच, उठाईगीर संपेरा.
कुत्ते, कमीने मैं तुझे बहुत अच्छी तरह पहचानता हूँ.
अरे जानवर, मैं तेरी रग-रग जानता हूँ.
ये सब जो तूं सुना रहा है न,
ये तो तेरा दिखावटी रूप है.
अरे शैतान तूं तो पूरा का पूरा यमदूत है.
तेरी नापाक हरकतों से न जानें कितनी कलियाँ
खिलने से पहले ही मुरझा गयीं.
तेरी काली करतूतें न जाने कितनों की अर्थी सजा गयीं.
अरे नालायक, नामर्द, छिछोरा, मवाली
लोगों की ज़िन्दगी में आग़ लगा,
तूं मनाता है ईद और दीवाली.
जी में यही आता है
कि -
तुझे दूँ एक भद्दी गाली - नेता कहीं का.
इतना सुनना था कि -
प्यार सारा कुछ भांप गया
और सिर से लेकर पैर तक कांप गया.
उसके पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई.
आती-जाती सांस अटक गई.
उसने सिर पर हाथ मारा,
थोड़ा सोचा-विचारा.
दिल को टटोला और फिर घिघियाती आवाज में बोला -
अरे, माई-बाप मुझ बदनसीब को कैसे पहचान लिया.
मैं नेता हूँ, ये कैसे जान लिया?
मैंने उसकी बात सुन कर चौंका
लेकिन देख कर सही मौक़ा.
अँधेरे में फिर एक तीर मारा
उसे जमकर धिक्कारा -
अबे, बहुरूपिये मैं तेरा सारा राज जानत हूँ.
तुझे बहुत अच्छी तरह पहचानता हूँ.
अब तो मैं तुझे तेरे किये की सजा दिलवाउंगा.
तुझे जीते जी दीवार में चिनवाऊंगा.
बहरहाल, जो पूछता हूँ वो सच-सच बता
वर्ना, पीट-पीटकर कर दूंगा तुझे बेहाल.
कान लगा के सुन और बता मेरा सवाल
बता, वो असली प्यार कहाँ है? ? ? ? ? ? ? ? ? ? ? ? ?
मेरा सवाल सुन उसके हाथ के तोते उड़ गए
और दोनों हाथ दीन भाव से
स्वत: ही जुड़ गए.
कांपती आवाज में वह बोला -
माई-बाप कृपा कर मेरा मेरा राज न खोलिये,
आपको सब कुछ संक्षेप में बताता हूँ,
कृपया धीरे बोलिए.
फिर किसी मुजरिम की मानिंद
उस हत्यारे ने अपना मुँह खोला
और धीरे से बोला -
कई वर्ष हुए, एक दिन जब
मेरे भीतर का नेता पूरी तरह जाग गया
और मेरे अंदर का इंसान मुझे छोड़कर भाग गया.
तो मैंने कुर्सी पाने की हवस में
अपने समर्थकों के साथ मिलकर प्यार को ठिकाने लगा दिया.
और उसकी कुर्सी पर कब्जा जमा लिया.
तब से मैं ही वेश बदलकर प्यार की सत्ता चला रहा हूँ.
और भोले-भाले इंसानों को उल्लू बाना रहा हूँ.
प्यार का ये कबूलनाम सुन मैं भीतर तक हिल गया.
ऐसा लगा मानो सब कुछ मिट्टी में मिल गया.
दुनियांवालों, अब आप जान लीजिये.
और ये दर्दनाक और भयंकर सच मान लीजिये
कि -
असली प्यार अब इस दुनियाँ में नहीं रहा,
हाँ, जो कुछ सच है मैनें आप से वही कहा है,
बहरहाल,
अब आप भी प्यार कीजिये तो जरा संभलकर
ख़्वाबों की रंगीन दुनियाँ से निकलकर.
आँख-कान खोलकर, स्थितियों को तोलकर.
दिल के साथ दिमाग जरूर लगाइए.
तब प्यार करने की हिम्मत जुटाइये.
वैसे, आज की युवा पीढ़ी तो हुस्न की दुनियाँ में गिरफ्तार है.
युवतियों की तो बात ही न पूछिये
उनके लिए तो उनका प्रेमी ही भगवान् का अवतार है.
दो टूक बात कहूँ तो इनके हाथों
सभ्यता व संस्कृति तार-तार है.
मगर ऐसे में भी उन्हें मेरी एक नेक सलाह है -
ये समझना
कि -
प्यार में सब कुछ जायज है,
निहायत नाजायज है.
अतः प्यार करने से पहले संभलिये,
और प्यार में दो कदम आगे
तो एक कदम पीछे भी चलिए.

Topic(s) of this poem: love

Form: ABC


Poet's Notes about The Poem

प्यार के नाम पर हमारे समाज में विशेष कर महानगरों में जो अपसंस्कृति कोढ़ में खाज की मानिंद संक्रमित हो रही है और उसके जो भयावह दुष्परिणाम हमारे समक्ष आ रहे हैं. उन्हीं परिणामों और उसकी पृष्ठभूमि के धरातल पर अवतीर्ण होकर ‘प्यार का कबूलनामा' कविता आप तक पहुँची है.

Comments about प्यार का कबूलनामा by Upendra Singh 'suman'

  • Abhilasha Bhatt (1/17/2016 11:50:00 AM)


    Ye Sab sach hai....aisa mahanagron main aam baat hogai hai...liked it.....thanx for sharing :) (Report) Reply

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    0 person did not like.
  • Kumarmani Mahakul (1/17/2016 11:46:00 AM)


    Acceptance and oath of love is always very interesting and inspiring. Very nice drafting shared on really.10 (Report) Reply

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Poem Submitted: Sunday, January 17, 2016



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