काश ऐसा हो Poem by abhilasha bhatt

काश ऐसा हो

Rating: 4.5

वीरानों में मैं
इंतज़ार तुम्हारा करूँ
और तुम आ जाओ
काश ऐसा हो
लम्हें सारे साथ तुम्हारे
सदियों के बन जाएँ
काश ऐसा हो
मेरी सर्द सुबहों के
तुम गुनगुनी धूप बन जाओ
काश ऐसा हो
नासूर से ज़ख़्मों के तुम मेरे
मरहम कोई बन जाओ
काश ऐसा हो
बेकल दिल के मेरे
तुम चन्द लम्हातों के
सुकून कोई बनकर आओ
काश ऐसा हो
टूटे बिखरे वजूद को मेरे
रेज़ा रेज़ा हुए माज़ी को
तुम जज़बात के हाथों से सम्भालो
काश ऐसा हो
रुके हुए जीवन कोे मेरे
तुम धारा दे जाओ
काश ऐसा हो
दूर भी जाओ
तब भी पास रहो
ऐसी यादें दे जाओ
काश ऐसा हो..

Saturday, November 26, 2016
Topic(s) of this poem: hope
COMMENTS OF THE POEM
M Asim Nehal 27 November 2016

Kya baat hai.......... टूटे बिखरे वजूद को मेरे रेज़ा रेज़ा हुए माज़ी को तुम जज़बात के हाथों से सम्भालो काश ऐसा हो..... Sahi hai....100+++

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Mithilesh Yadav 26 November 2016

Romancing. with feelings...... Well penned mamji

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