Dr. Navin Kumar Upadhyay


दिन भर तेरे द्वार को मैं निहारता रहा - Poem by Dr. Navin Kumar Upadhyay

दिन भर तेरे द्वार को मैं निहारता रहा,
जितनी बार देखा, दीप जलाता रहा।।
हृदय दीपक बनाया, भाव बाती सजाया,
आँसू घृत स्नेह भर, राह तेरी तकता रहा।।
ध्यान दिया न तुमने, रहे अपने में मशगूल,
मैं जा बैठा गली मोड़, न नजरें हिलाता रहा।।
अनजाने को क्या मालूम, कोई देखता राह,
मेरे न कोई ठौर-ठिकाने, मँद मुस्कुराता रहा।
तुम जब समझे बाद में, जब छोड़ा न द्वार तेरा,
कसक उठ गई तेरे जिगर, आँसू छलकता रहा।
तुम भी आ गए करीब, क्यों बैठे हो तुम यहाँ?
इतने दीपक जलाये क्यों, हाथ तेरा जलता रहा।
मैं सहम कर, बोला हुजूर, नहीं जले हाथ केवल,
गमे -जुदाई में मेरा दिल, जल खाक होता रहा।
अब आ गए हो, महबूब, छोड़ना न इक पल भी,
'नवीन' देखा हुस्न तेरा, न जुदाई सह सकता रहा।

Topic(s) of this poem: religious


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Poem Submitted: Monday, March 20, 2017



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