बस यादे वो पुरानी यादे
बस यादे वो पुरानी यादे जो मुझे मेरे बचपन मे ले जाती,
कुछ खट्टी, कुछ मीठी यादे जो मुझे आज भी याद आती।।
कभी काग़ज़ का हवाई जहाज, कभी काग़ज़ की नाव,
कभी पापा की साईकिल जिसमें उलझता मेरा पांव।।
वो विद्यालय की कक्षा मे बिछी जो चटाई,
जिस पे सोता मेरा मोटा भाई ।।
जब मास्टर जी मारते उसको डंडा,
उसके निकल आता अंडा।।
बनता जब वो मुर्गा,
और कूकडू कू की आवाज़ मुँह से निकालता,
तब हमें और भी मज़ा आ जाता।।
सब खेलते साथ - साथ गुल्ली डंडा,
कभी कंँचे भी खेला करते,
लड़ते भिड़ते फिर भी एक हो जाया करते।।
एक दूसरे का खाना साथ - साथ खाया करते,
और खूब बाते भी किया करते।।
मेरे यारों की टोली जब मचाती धमाल,
सुबह हो या शाम करती खूब कमाल।।
शायद कोई नहीं हैं उनके जैसा दानी,
हर कोई मांगे उनके आगे पानी।।
गाँव की चौपाल की क्या बात बताये,
हर कोई शाम वहाँ बिताये।।
जहाँहोती हँसी ठिठोली की बौछार,
वहाँ हर कोई कर जाता एक दूसरे से प्यार ।।
गाँव का वो प्यारा अखाड़ा,
जिसने हर किसी को पटक - पटक के पछाड़ा।।
जब खेत की पगडंडी से गुज़रते,
खड़ी फसलों पर यूँही हाथ फेरते।।
चढ़ आम के पेड़ पर आम तोड़ते,
माली के आने पर छिपने की कोशिश करते ।
जब वो चिल्लाता तब हम भी खूब शोर मचाते,
उसको चिढ़ाते हुए यूँही भाग जाते।।
वो बारिश के पानी मे खूब मज़ा आता,
जब मेरी काग़ज़ की कश्ती के साथ मेरा यार अपनी कश्ती का मुकाबलाकर जाता।।
कभी मैं आगे वो पीछे, कभी वो आगे मैं पीछे
और यह सिलसिला चलता रहता,
जब तक माँ का डंडा पीछे से नहीं पड़ जाता।।
फिर क्या हम आगे - आगे वो (माँ)पीछे -पीछे,
और जो हमारी धुनाई होती तो और मजा आ जाता,
क्यूंकि मार खा के हमारा खाना तो यूँही हजम हो जाता।।
मत पूछो उन यादों के बारे में,
जो मुझे आज भी मेरा बचपन याद कराती।।
मुझे जगजीत सिंह की ग़ज़ल याद आती है
यह दौलत भी ले लो, यह शौहरत भी ले लो
भले ही छिन लो मेरी जवानी
कोई लौटा दे मेरे बचपन के दिन वो काग़ज़ की कश्ती वो बारिश का पानी
एक प्यारा सा एहसास मेरी नन्ही कलम से
(शरद भाटिया)
बचपन के नटखट दिन जब याद आते हैं तो अपने साथ उस समय का सारा घटनाक्रम चलचित्र की भांति आँखों के सामने से गुजरने लगता है. बड़े होने पर कितना सुख देती हैं हमें वो यादे. धन्यवाद, शरद जी.
Jagjit ji ke ye hi gana mere maan bhi aaya. Bahut khoobsurti se ek ek ehsaas ko piryoa hai mano jaise pura Bachpan aakho ke samne fir se khil utha ho wo dosto ka maza uthana aur wo ma ki maar khana aur fir bhi gilli danda aur kanche khelna....koi to lauta do mera wo bachpan. Umda rachna.
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Ye wo yaden hi toh hai jo hamein woh guzre pal phir se jeene ka ehsaas dilati hai. Bahit khoob 100***