मानवजात का अंदाज Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

मानवजात का अंदाज

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मानवजात का अंदाज
बुधवार, ७ अक्टूबर २०२०

जब तक मानवजात है!
उनकी सोच में आत्मघात है
छीपकर घात लगानेकी मनोवृत्ति है
तबतक हमें आपत्ति है।

उत्तर अपने आप मिल जाएगा
हमारा परिचय आप सबको दे जाएगा
हम क्यों इतने निचे गिरे हुए है?
और हमें असल मे क्या चाहिए?

हमारे हाथ में हथिया है
क्योंकि हम डराना चाहते है
दुसरों पे राज करना चाहते है
दूसरों को गुलाम बनके रखना चाहते है।

अपने जमीर को पूछिए
आपने कभी दुसरों के आंसू पोंछे है?
आपने कभी दुरसों के दुख -दर्द को जाना है?
यदि नहीं तो इनबेईमानी है।

कहने के लिए सब बातें अच्छी लगती है
सुनने में कर्णप्रिय भी लगती है
पर ये सब सच से कितनी कोसो दूर है?
जिसका हमें अफ़सोस जरूर है।

ना इस्तेमाल करे हम सस्ते फलसफा का!
ना दिखाए हम दुनिया को अपने स्वार्थीपने का
जब तक दुनिया कायम है
येसिलसिला भी अपनी जगह पर है।

जो सलाह देते है वो सुफी नहीं है
जो सीख देते है उनमेबड़ी कमी है
आसमान भी वही था और आज भी है
हम है, बेईमान भी है और धोखेबाज भी यही है।

बड़े-बड़े भाषण हम हररोज सुनते है
उनके कारनामों की कहानी भी पढ़ते है
फिर भी हम ज्यादा ध्यान उनकी तरफ नहीं रखते!
क्योंकि हम मानवता का सही अंदाज लगाते है।

डॉ जाडीआ हसमुख

मानवजात का अंदाज
Wednesday, October 7, 2020
Topic(s) of this poem: poem
COMMENTS OF THE POEM
Mehta Hasmukh Amathalal 07 October 2020

फिर भी हम ज्यादा ध्यान उनकी तरफ नहीं रखते! क्योंकि हम मानवता का सही अंदाज लगाते है। डॉ जाडीआ हसमुख

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