मजहबी खुदा Poem by C. P. Sharma

मजहबी खुदा

मजहबी खुदा

खुदा ने हर ज़िस्म को
तराशा, संवारा, सजाया
उसमें खुद बैठ के
उसे अपना ईदगाह बनाया

हैरां हूँ इंसान की हिमाकत पे
पहाडों को तोडा, जांगलात काटे
खुदा को खुद से अलग किया
ईंट पत्थर का इदगाह बनवा दिया

बात यहीं मुक्कमिल हो तो भी बात बने
इसे भी मजहबी जामा पहना दिया
तूने तो ईदगाह तोडे और ज़शन मनाया
हर तरह सेखुदा को खुद से दूर भगया

ए इंसां,
किस हद तक खुदा को शर्मसार करोगे
बंद करो ये सब,
कब तकमजहबी खुदा की तिजारत करोगे

मजहबी खुदा
Wednesday, November 29, 2017
Topic(s) of this poem: god
COMMENTS OF THE POEM
Ravinder Soni 29 November 2017

जनाब ए आली, यह नज़्म पढ़ी और जोश मलीहाबादी के दो मिसरे उनकी एक रुबाई के याद आ गए; फ़रमाया है - हम ढूंढ चुके हमें मिला ना अल्लाह - अब फ़र्ज़ है उसका कि वो हमको ढूंढे

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Bissau, Rajasthan
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