मजहबी खुदा
खुदा ने हर ज़िस्म को
तराशा, संवारा, सजाया
उसमें खुद बैठ के
उसे अपना ईदगाह बनाया
हैरां हूँ इंसान की हिमाकत पे
पहाडों को तोडा, जांगलात काटे
खुदा को खुद से अलग किया
ईंट पत्थर का इदगाह बनवा दिया
बात यहीं मुक्कमिल हो तो भी बात बने
इसे भी मजहबी जामा पहना दिया
तूने तो ईदगाह तोडे और ज़शन मनाया
हर तरह सेखुदा को खुद से दूर भगया
ए इंसां,
किस हद तक खुदा को शर्मसार करोगे
बंद करो ये सब,
कब तकमजहबी खुदा की तिजारत करोगे
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जनाब ए आली, यह नज़्म पढ़ी और जोश मलीहाबादी के दो मिसरे उनकी एक रुबाई के याद आ गए; फ़रमाया है - हम ढूंढ चुके हमें मिला ना अल्लाह - अब फ़र्ज़ है उसका कि वो हमको ढूंढे