हाथ बांध कर क्या क्या दिखलाती है, ज़िन्दगी
मजबूर देख कर बड़ा इतराती है, ज़िन्दगी
ये जान लिया है तूने भी अभी
तक़दीर के हाथ खिलौना हैं हम सभी
वरना क्यों इस कदर झूला हमें झूलती
खुद नाचती है और तमाशा हमें दिखती
कहते हैं लोग की हम जी रहे हैं ज़िन्दगी
लेकिन तू जानती है तभी तो मौत के करीब ले जा रही है ज़िन्दगी
वक़्त के हाथ हम से कसरत करवाती है ज़िन्दगी
बदनाम इसको कर के फिसल जाती है ज़िन्दगी
अफ़सोस है की इतना भी नहीं बताती है ये ज़िन्दगी
ले जाकर हमको कहाँ सुलाती है ये ज़िन्दगी.
वाह! बहुत खूबसूरती से आपने जीवन में आने वाले उतार-चढ़ाव व अप्रत्याशित घटनाओं की ओर पाठक का ध्यान खींचा है. मनुष्य पल पल मृत्यु की दिशा में अग्रसर हो रहा है लेकिन जिंदगी इन सबसे बेखबर दिखाई देती है. यही जिंदगी का फ़लसफ़ाना सफ़र है. बहुत खूब असीम जी.
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Ye zindagi...haan ye zindagi Kya kuch dikhlati hai ye zindagi Kabhi rulati kabhi hasati Kya kuch keh jati Bus ye zindagi Kuch khatti To kuch meethi Nebhati saath hamesha Dekhate hue ye nazara Na kuch kam na kuch jayada Barabar hai paldha hamara Ye zindagi meri zindagi Nyari meri zindagi...good poem. Thank-you.