संसार Poem by C. P. Sharma

संसार

संसार

ये संसार है
यहांबदलावनिररंतर
यहाँमिलन औरविरहमेंलगे अंतर

एक बिन्दू पेन ठहरे
ठहरेतो सड़न है
चंचल इस के नयन हैं

यहाँफूलबहुरंगी
मेहक भीहैतरंगी
तितलीमन बना भ्रींगी

यहाँ मायाखेले खेल
जिसमें लिपटीअमर बेल
इसके रिश्ते हैं बेमेल

यहाँ कैसा है न्याय
ज़ज कहें हुआ अन्याय
मांगें जनता से परियाय

अज़ब है दास्तांइसकी
गज़ब अंदाजे बयां है
तारीफ करूं मै किसकी

येमाया है य़ारों
कभी हुई है किसी की?

संसार
Thursday, February 22, 2018
Topic(s) of this poem: life,world
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C. P. Sharma

C. P. Sharma

Bissau, Rajasthan
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