मेरे मित्र और मैं
मित्र, दोस्त, यार, friend, सखा,
यह शब्द सुनते ही बचपन की याद आ जाती हैं।।
कभी साथ - साथ गुल्ली डंडा, कंँचे खेला करते थे,
एक दूसरे के टिफिन का खाना साथ - साथ खाया करते।।
आज इस मित्रता दिवस पर मैं अपने कुछ एहसास अपने यारों के बारे में कहना चाहता हूँ
किस - किस की दोस्ती को मैं गले लगाऊँ, .
किस - किस को अपना यार बताऊँ ।।
यहाँ हर कोई तो अपनापन दिखाता है,
मुझे गले लगाने के लिए बेक़रार सा हो जाता है।।
माना यह दुनिया मतलबी हैं,
फिर भी शायद मैं हर किसको अपना यार बनाऊँ।।
हर किसी के ग़म को मैं अपना बताऊँ,
यहाँ हर यार कुछ ना कुछ सिखाता है ।।
शायद मुझे आज भी बच्चा बताता है,
माना मैं बड़ा हो गया हूँ,
फिर भी मुझे "छोटे" बुलाता हैं ।।
खुद दारू पीकर मुझे लस्सी पिलाता है,
हर छोटी - छोटी बातें बड़े भाई की तरह समझाता हैं।
मेरी की हुई गलतियों को छिपाता हैं,
खुद डाँट खाकर मुझे बचाता है।।
मुझसे कहता हैं क्यू घबराता हैं,
तू आगे चल, मैं तेरे पीछे हूँ ।।
सीना तान के कहता है,
कि तेरी आँखों से आँसू,
चेहरे से परेशानी,
दिल से मायूसी,
जिंदगी से दुःख,
और हाथों की लकीरों से मौत तक चुरा लूँगा,
मैं यार हूँ तेरा, तेरे सारे ग़मों को भूला दूँगा।।
एक प्यारा सा एहसास मेरी नन्ही कलम से
(शरद भाटिया)
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A very beautiful poem von friendship so well captured every emotions of life. Lovely nostalgic poetry.