एक शाम मैंने देखा ज़िन्दगी को Poem by M. Asim Nehal

एक शाम मैंने देखा ज़िन्दगी को

Rating: 5.0

एक शाम नदी किनारे, ज़िन्दगी को देखा मैंने,
पंछी बन उड़ते हुए बादलों के पार जाने की तमन्ना लिए.

एक शाम फूलों की बगीचे में ज़िन्दगी को देखा मैंने,
तितली बन मंडराते हुए, सब फूलों से रस लेने को फड़फड़ाते हुए.

एक शाम समंदर किनारे, ज़िन्दगी को देखा मैंने,
लहरों पे मचलते हुए, बार बार आकर किनारों से टकराते हुए.

एक शाम पहाड़ों के पास ज़िन्दगी को देखा मैंने,
बादलों संग बतियाते हुए नदियों संग बलखाते हुए.

एक शाम किसी महफ़िल में ज़िन्दगी को देखा मैंने,
शमा संग जलते हुए रोशनी को लुटाते हुए.

आज शाम ज़िन्दगी थक गयी है कुछ थम सी गयी है,
दौड़ती थी जो हमेशा नए रंग और रूप में ठहर गयी है किसी आँखों में.

Friday, March 19, 2021
Topic(s) of this poem: philosophical
COMMENTS OF THE POEM
Rajan Trajan Renganathan 19 March 2021

Wah wah kya badiya phalsafa hai Zindagi ka.

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