गन गुन गुनगुनाता हुआ
सुरो की सरगम बजाता हुआ
ये मन! हां ये मेरा मन।।
हसीन वादियों की सैर पर निकल चला
चिड़ियों की चहचहाहट से मंत्र मुग्ध
प्रकृति के गोद में आंखे मूंद दो गया।।
धुनों की समझ हो न हो
सरगम की पकड़ हो न हो
मुहोब्बत आपको गायक बना ही देती।।
वो बारिश की रिम झीम
और पत्तियों की सरसराहट।
वो हवाओं का चहकना
और वो बर्तनों का खनकना
बस एक ही स्वर में झलका जा रहे
हाले दिल का दीदार करा जा रहे।।
न ही गर्म है की चीखू
न ही ठंडी की ऊगलू
बस मन ही मन पिसे जा रहे।।
न ही रात को चैन
न दिन में आराम
बस गम-ए-आलम में खोए जा रहे।।
ओह! ठहर जाओ एक पल के लिए
हाले-दिल का बखान सुन लो
मेरी दुखती रग पर हाथ फेर कर सहला जाओ।।
ऐ मुसाफिर! ऐ मुसाफिर!
मेरे इस इस्तक़बाल का
इनकार न करो इस पल।।
वरना ढूंढते रह जाओगे तुम
रेत में सुई के किनके के समान
जो मैं रूठ जाऊं और मूंह मोड़ लू।।
© वर्षा मधुलिका
२१.०६.२०२१
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Wah wah kya baat hai..Full stars..