तलाश Poem by Dr. Yogesh Sharma

तलाश

Rating: 5.0

बर्फ का होकर, इंसान जी रहा है,
मोम के पिघ्लते मकान मे, अलाव सेक रहा है।
कोहरे से ढ्के ऑसमा मे, सूरज तलाश रहा है,
जिहादिऑ के इबादतखाने मे, खुदा तलाश रहा है।

खाल शेर की पहन कर गद्दार, शिवाजी बन रहा है,
और आतंकियॉ के जनाजे मे, मातम मना रहा है।
बबूल के कांटॉ मे, गुलाब तलाश रहा है,
और इंसान मौत के मातम मे, आंसूं तलाश रहा है।

शराब की बोतल मे, शहद तलाश रहा है,
खाली लिफाफॉं मे, रिश्ते तलाश रहा है।
मकान की दहलीज पर, आह्ट तलाश रहा है,
और भागती इस जिंदगी मे, सुकुन तलाश रहा है।

Monday, January 14, 2019
Topic(s) of this poem: life
COMMENTS OF THE POEM
M Asim Nehal 14 January 2019

Wah wah kya baat hai...भागती इस जिंदगी मे, सुकुन तलाश रहा है

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