ज़िंदा हूँ.... Poem by Praveen Yadav

ज़िंदा हूँ....

तेरी यादों के साये मे ज़िंदा हूँ बस तेरे लिए
तेरी बाहों की पनाहों मे ज़िंदा हूँ बस तेरे लिए

ख़यालो मे बुने जो तेरे ख्वाब हैं
हर ख्वाब मे रहती एक कसक है
इसी कसक की बैचेनी मैं ज़िंदा हूँ बस तेरे लिए

मेरे ख्वाबो की ज़मी पर खिलती
हर पल मुझमे समाती तेरी सदा
तेरी इन सदाओ की दिवानगी मैं ज़िंदा हूँ बस तेरे लिए

बीते लम्हो की जो दास्तान है
बिन कहें आंखो से जो बयां हैं
तेरी इस खामोशी मैं ज़िंदा हूँ बस तेरे लिए

गुजरते पलो के दामन मैं
खुशियाँ सँजोते तेरे आँचल मैं
तेरा ही साया बनकर ज़िंदा हूँ बस तेरे लिए

तन्हाइयों मे मूस्कुराती तेरी अदाओ मैं
बैचेनियों मे शामिल तेरी कहानियों मैं
तेरी ही निशानियों के संग ज़िंदा हूँ बस तेरे लिए

तेरी खुशबू मे बहकते ये कदम
रब से मांगते है तुझे हर जन्म
तुझ संग जिंदगी बिताने को ज़िंदा हूँ बस तेरे लिए
तुझ पर जान लूटाने को ज़िंदा हूँ बस तेरे लिए....।

Sunday, May 18, 2014
Topic(s) of this poem: devotion
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something which heart feel with her....
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