आज और मैं Poem by Praveen Yadav

आज और मैं

आज कुछ ठहर सा गया हूँ मैं
अपने ही अंदर बिखर सा गया हूँ मैं
बेजुबान लफ्ज और खामोश हैं आंखे
आज खुद से ही डर सा गया हूँ मैं

सपनों के बीज क्यूँ पानी को तरसे हैं
अपने ही ख्वाब क्यूँ मुझ पे बरसे हैं
दिल मैं कैद अब सिर्फ तनहाई हैं
मुझसे ही रूठी अब मेरी परछाई है

हर नजर अब मुझे आजमाती हैं
किस्मत भी अब मुझपे गुर्राती हैं
धुंधला सा हो गया हैं आज आईना भी
मेरे अक्स को भी मुझसे शर्म आती हैं

चीखती हैं अब मेरी आहें मुझ पर
खफा हैं मेरी हर चाह मुझ पर
तड़पती हैं सोच भी मेरे साथ चलने पर
तरसते हैं खयाल भी मेरे हाल पर

धड़कन मेरी अब धीमे होने लगी हैं
तेवर मेरे सब ठंडे पड़ने लगे हैं
हंसी भी मेरी अब छूट सी गयी हैं
खुशियाँ भी मुझसे दगा करने लगी हैं

पर जाने किस आस पे मैं चलता जा रहा हूँ
टुकड़े हुए ख्वाबो पे मैं पलता जा रहा हूँ
जाने किस मोड पे वो वक़्त मिल जाये
और
मेरे अनाथ से सपनों को इक पनाह मिल जाये।

Saturday, May 17, 2014
Topic(s) of this poem: life
POET'S NOTES ABOUT THE POEM
this poem is directly related to my own life...i.ve just write what was happening with me....
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