आज कुछ ठहर सा गया हूँ मैं
अपने ही अंदर बिखर सा गया हूँ मैं
बेजुबान लफ्ज और खामोश हैं आंखे
आज खुद से ही डर सा गया हूँ मैं
सपनों के बीज क्यूँ पानी को तरसे हैं
अपने ही ख्वाब क्यूँ मुझ पे बरसे हैं
दिल मैं कैद अब सिर्फ तनहाई हैं
मुझसे ही रूठी अब मेरी परछाई है
हर नजर अब मुझे आजमाती हैं
किस्मत भी अब मुझपे गुर्राती हैं
धुंधला सा हो गया हैं आज आईना भी
मेरे अक्स को भी मुझसे शर्म आती हैं
चीखती हैं अब मेरी आहें मुझ पर
खफा हैं मेरी हर चाह मुझ पर
तड़पती हैं सोच भी मेरे साथ चलने पर
तरसते हैं खयाल भी मेरे हाल पर
धड़कन मेरी अब धीमे होने लगी हैं
तेवर मेरे सब ठंडे पड़ने लगे हैं
हंसी भी मेरी अब छूट सी गयी हैं
खुशियाँ भी मुझसे दगा करने लगी हैं
पर जाने किस आस पे मैं चलता जा रहा हूँ
टुकड़े हुए ख्वाबो पे मैं पलता जा रहा हूँ
जाने किस मोड पे वो वक़्त मिल जाये
और
मेरे अनाथ से सपनों को इक पनाह मिल जाये।
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