नुपुर ध्वनि इतला रही
किसी के आने की आहट
हे सखी ऋतु बसन्त का वैभव इतना
जितना पुष्प छुपा है आंचल में।
ऋतु वसंत की पंखुड़ियां
कुम्हला रही पल पल प्रतिपल
हल्की सी बयार बही क्या
पृथ्वी की धूरी बदल गई।
एक हवा का झोंका आया
चैत्र माह का सुभागमन आया
चैत्र माह संचित की ऊष्मा
पृथ्वी के उर स्थल से।
फिर नहलाया पूरी प्रकृति को
जैसे गागर में हो सागर
अधरों को अलका चूम रही
जब बरबस आनन पर है आये ।
04/10/2025
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@ Ramesh Rai
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