बाहर के नहीं बिहार के हैं। Poem by Anjum Alinagari

बाहर के नहीं बिहार के हैं।

बाहर के नहीं बिहार के हैं।
हम गंगा के उस पार के‌ हैं।

जिस पार को मिथिला कहते हैं।
हम उस मिथिला में रहते हैं।

है मिथिला का दिल दरभंगा।
जहां मिल कर रहता है बंदा।

जहां दो दो यूनिवर्सिटी है।
जहां, आपस में यूनिटी है।

जहां कई त‌रह की मंडी है।
जहां, रहता कुछ पाखंडी है।

जहां माछ मखाना होता है।
जहां, आम का दाना होता है।

जहां जल कर देता मज़ा कबाब।
जहां, पूरा होता, हर एक ख़्वाब।

वो धरती, प्यार की धरती है।
जो राज, दिलों पे करती है।

मिथिला की अपनी भाषा है।
जो ख़ुद में एक, बताशा है।

हर क्षेत्र में हो बिहार का नाम ।
मिथिला का मेरेे, है पैग़ाम।

हम, जहां कहीं भी जाते हैं।
गै़रों को गले लगाते हैं।

हम मेहनतकश मज़दूर भी हैं।
हम, मेहनत से मशहूर भी हैं ।

हो रीज़्क़ जहां, की जाते हैं।
हम मेहनत कर के खाते हैं।

हो मज़हब ज़ात भले कुछ भी
हम काम सभी के आते हैं।

© अंजुम अलीनगरी, दरभंगा बिहार

POET'S NOTES ABOUT THE POEM
बिहार को लोग जब बाहर का समझने लगते हैं तो ऐसी कविता मन के अंदर जन्म लेती है
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Anjum Alinagari

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Alinagar, Darbhanga
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