हक़ और हक़दार के लिए निकलो।
अमन और प्यार के लिए निकलो।
नफ़रतों को हमें मिटाना है।
बाग़े हिन्दुस्ताँ सजाना है।
चहके हर शाॅख़ पे यहाॅ बुलबुल।
ऐसा दिलकश वतन बनाना है।
जीत न हार के लिए निकलो।
हक़ और हक़दार के लिए निकलो।
दिल के अंदर न अब कदूरत हो।
सबसे रिश्ता ये ख़ुबसुरत हो।
ग़म सताऐ न, डर किसी को लगे।
सबको सबकी यहाँ ज़रूरत हो।
दर्दे इज़हार के लिए निकलो।
हक़ और हक़दार के लिए निकलो।
© अंजुम अलीनगरी, दरभंगा बिहार
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