हिंदू मुस्लिम सब प्रवासी। मूल निवासी आदिवासी। Poem by Anjum Alinagari

हिंदू मुस्लिम सब प्रवासी। मूल निवासी आदिवासी।

हिंदू मुस्लिम सब प्रवासी।
मूल निवासी, आदिवासी ।

प्यार प्राकृति से करते।
अपने हक़ की ख़ातिर लड़ते।

जल जंगल जमीन के रक्षक।
अपने परम्परा के संरक्षक।।।

ढ़ोल बजाते हैं और ताशा।
सच्चे मन की ये परिभाषा।

हो‌, कुड़माली या संथाली।
भाषा इनकी सभी निराली।

बिरसा को भगवान हैं कहते।
भारत की पहचान हैं कहते।

तीर कमान चलाते हैं ।।।
ज़ालिम से टकराते हैं।।।।
सरहूल , टूसु का ये पर्व,
हर्ष के साथ मनाते हैं।।।।
भूख लगी हो, ज़हर छोड़कर
जो मिल जाए खाते हैं।।।

पोष्टिक होता, इनका खाना।
चुनकर खाते एक एक दाना।

देसी अण्डा , देसी मुर्ग़ी,
दूध, दही और ऊपर से घी ।।।

ये खाते और पीते हैं।
इनको एस टी कहते हैं।

हेमंत जी इनके लीडर हैं।
मज़बूत भी हैं, और निडर हैं।

जो उनका साथ निभाते हैं।
जो रस्ता सही दिखाते हैं।।।

झारखंड के आदिवासी को ।।।
ये दिवस बहुत मुबारक हो।।।

उम्मीद है शिक्षित बनेंगे सब ।
मेहनत से बच्चे पढ़ेंगे सब।।

पिएंगे न हड़िया, दारू, शराब।
तभी बच्चे देखेंगे आप के ख़्वाब।

हक़दार को हक़ मिल जाएगा।
एक दिन वो दौर भी आएगा।।।

जब जंगल काटने वाले लोग ।
जंगल में रहने वालों को, , ,
इज़्ज़त की नज़र से देखेंगे।।।।
© अंजुम अलीनगरी, दरभंगा बिहार

Sunday, August 9, 2026
Topic(s) of this poem: celebration,hindi
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विश्व आदिवासी दिवस के उपलक्ष्य में लिखी गई कविता
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Anjum Alinagari

Anjum Alinagari

Alinagar, Darbhanga
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