हवा के रुख़ को मोड़ा जा रहा है।
ख़ुदा के घर को तोड़ा जा रहा है।
सड़क पर जो भी उतरें मांग लेकर,
उन्हीं के सर को फोड़ा जा रहा है।
लड़ें आपस में हिंदू और मुसलमां
शगुफ़ा ऐसा छोड़ा जा रहा है।।।
जहां हम थे नहीं, ऐसी जगह से,
हमारा नाम जोड़ा जा रहा है।।।
मुहब्बत की दुकां को बंद करने,
बहुत तेज़ी से दौड़ा, जा रहा है।
© अंजुम अलीनगरी, दरभंगा बिहार
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