यही है भाई अच्छा दिन।
या है भाई ओछा दिन ।
पूछ रहा हूं ज़रा बताओ।
हम सबको थोड़ा समझाओ।
हिंदू मुस्लिम ही करना है।
या मुद्दे पे भी लड़ना है।
बिछड़ रहें हैं, दिन प्रतिदिन।
फिर भी है एहसास न लेकिन।
जाहिल अनपढ़ राज है करता।
पढ़ा लिखा बस आहें भर्ता।।
मेहनत का परिणाम यही है।
करने को कुछ काम नहीं है।
पढ़ा लिखा भी है बेकार।।
हक़ को तरस रहा हक़दार।
अहमक़, नादां, कहते हैं,
क्या कर सकती है सरकार।।
जनसंख्या का रोना है
फिर तो ये सब होना है।।।
समझो खेल सियासत का ।
जहां क़द्र नहीं लियाक़त का ।।
जब धर्म और ज़ात पे लड़ते हैं।
कमज़ोर हम ख़ुद को करते हैं।।
सोंचो तो ज़रा, परखो तो ज़रा।
मुद्दे पे लड़ो, मुद्दा है बड़ा ।।।।।
© अंजुम अलीनगरी, दरभंगा बिहार
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem