से भगवान, हे भगवान , अपने देश की संस्कृति का निकल रहा है प्राण Poem by Anjum Alinagari

से भगवान, हे भगवान , अपने देश की संस्कृति का निकल रहा है प्राण

हे भगवान! हे भगवान--

अपने देश की संस्कृति का
निकल रहा है प्राण ।

हे भगवान! हे भगवान

नफ़रत बांटो, राज करो
है कितना आसान।

हे भगवान! हे भगवान----

अपना नेता बड़का झुठ्ठा,
बहुत बड़ा बेईमान ।

हे भगवान! हे भगवान----

लड़ता है जब हिन्दू मुस्लिम,
मरता है इंसान।

हे भगवान! हे भगवान -----

अता पता कुछ चला नहीं के
कितना आया दान ।
कितना खाया दान।

हे भगवान, हे भगवान----

तू तू मैं मैं करने वाला,
टीवी पर वो कुत्ता साला
बांट रहा है ज्ञान।

हे भगवान! हे भगवान----

आपस में जो लड़ा रहा है,
है असली शैतान।

हे भगवान, हे भगवान----


किया नहीं कुछ, मिटा रहा है
जगह जगह से नाम

हे भगवान, हे भगवान----

तौल तराज़ू पे रख कर के,
देख मेरा ईमान ।
कल भी था, और आज भी है ये
अपना हिंदुस्तान!

© अंजुम अलीनगरी, दरभंगा बिहार

Friday, July 3, 2026
Topic(s) of this poem: nazm,urdu,hindi,indian,sad
POET'S NOTES ABOUT THE POEM
इसमें अलग अलग मद्दों पर अफ़सोस ज़ाहिर क्या गया है। देश संस्कृति को मिटाने शक्तियों पर तंज़ किया गया है।
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Anjum Alinagari

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Alinagar, Darbhanga
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