اناللہ واناالیہ راجعون
नईम आग़ाज़ रहलत कर गए हैं।
ये सुनकर मौत से हम डर गए हैं।
न घबराओ, वो अपना दीन लेकर,
वो रब से मिलने, रब के घर गए हैं।
बड़ा अख़्लाक़ था, किरदार आला।
तरीक़ा गुफ़्तगू का था निराला।
बहुत अफ़सोस होता, ग़म है सबको,
गुज़र जाता है जब अल्लाह वाला ।
उम्र भर इल्म का शम्मा जलाया।
बड़ी मेहनत से बच्चों को पढ़ाया।।
हूनर जो भी था, उसको आज़माया।
रहम करना तू उन पर अब ख़ुदाया।
उन्हें जन्नत ख़ुदा दे, ये दुआ है।
दुआ से बढ़ के अपने पास क्या है।
जो ग़लती हो गई हो, माफ़ कर दे ।
ख़ुदा उनके लिए दिल साफ़ कर दे।
मिला, माफ़ी तलाफ़ी कुछ हुआ न ।
यही है मौत, जो ढ़ूंढ़े बहाना ।।
गए हर ज़िम्मेदारी को निभाकर।
मदद करते थे वो अक्सर छुपा कर।
है छाया चार सू मातम का आलम।
छुपाते छुप नहीं पाता है ये ग़म ।।।
सब्र से काम लेना है सभी को।
सहारा बन सकेंगे हम तभी तो ।
© अंजुम अलीनगरी, दरभंगा बिहार
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem