धर्म की आड़ में, सारे अख़बार में Poem by Anjum Alinagari

धर्म की आड़ में, सारे अख़बार में

धर्म की आड़ में,
सारे अख़बार में।
बेच देते हैं,
नफ़रत को बाज़ार में।

हैं ख़रीदार जो ।
ज़ुल्म ढाते हैं वो ।
कर रहे हैं, वो रुसवा
मेरे मुल्क को।

जिनको लगता है
भारत हमारा नहीं।
उन से कह दो,
कि मुझ बीन गुज़ारा नहीं।
तेरी सारी सियासत का
मरकज़ हूं मैं।
प्यार, उल्फ़त, मुहब्बत, का
मरकज़ हूं मैं।

तुम मिटा न सकोगे
मेरे नाम को ।
गर मिटाया, तो भुगतोगे
अंजाम को ।।।।
रास्ता भागने का मिलेगा नहीं।
ऐसी देगी सज़ा, हिंद की सरजमीं।

दें तवज्जो , मुहब्बत के पैग़ाम को।
मुल्क के सारे बेहतर निगहबान को ।

नौजवानों का है,
अब यही फैसला।

बढ़ने देंगे न अब हम
कहीं फासला।

बस ये ख़्वाहिश है,
हिंदू मुसलमान की‌।
दूर तकलीफ़ हो,
आम इंसान की।
© अंजुम अलीनगरी, दरभंगा बिहार

Thursday, September 24, 2026
POET'S NOTES ABOUT THE POEM
भारतीय मुसलमान भारत देश एक ज़िम्मेदार शहरी है। इस की देशभक्ति पर शक करना इस देश पर ज़ुल्म करना है।
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Anjum Alinagari

Anjum Alinagari

Alinagar, Darbhanga
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