मेरी बेटी सोना है।
मां की एक खेलौना है।
पापा पापा कहती है।
सबसे मिलकर रहती है।
सुनते ही आवाज़ हमारी
गेट पे आ जाती है प्यारी ।
खिल जाता है चेहरा मेरा
शुक्र ए ख़ुदा है रब ये तेरा।
देखते ही ख़ुश हो जाती है।।
किसने किया क्या बतलाती है।
भाती है हर बोली उसकी ।
दोस्त है हर हमजोली उसकी।
आंगन घर में चलती है ।
बाहर नहीं निकलती है ।
घूमने में वो माहिर है।
घूमना उसकी ख़ातिर है।
कलमा पढ़ कर सोती है।
हो तकलीफ़ तो रोती है।
शौक़ बहुत है पढ़ने का ।
हर पल आगे बढ़ने का ।
कह दे वो जो, लाना है।
हरगिज़ नहीं भुलाना है।
वरना पास न आएगी ।
आने से कतराएगी ।।।
करती वो फरमाइश है।
ख़ुश वो रहे, ये ख़्वाहिश है ।
इल्म ख़ुदा दे, आला दर्जा ।
रब से यही, गुज़ारिश है।
बेटी है अनमोल रत्न।
जिससे है आबाद चमन ।
अल्लाहवाली बेटी मेरी ।
पांच भाई की एक बहन।
© अंजुम अलीनगरी, दरभंगा बिहार
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