जंतर-मंतर की आवाज़। Poem by Anjum Alinagari

जंतर-मंतर की आवाज़।

जंतर मंतर की आवाज़ ।
यहां के लोगों का अंदाज़।
जिसके दिल को भाता है।
वही वहां पे जाता है।


हक़ के ख़ातिर लड़ता है।
मरने से न डरता है।
भुखा प्यासा रहता है।
धूप की शिद्दत सहता है।।
पुरी दुनिया सुनती है,
जब भी कुछ ये कहता है।

मक़सद ज़ुल्म मिटाना है।
और मंज़िल को पाना है।
वादा उनका क्या क्या था,
उनको याद दिलाना है।।।
जीत के जो सब भूल गए
जो न कभी स्कूल गए, ,

सबको एक दिन जाना है

वक्त मिला है काम करो ।
देश को न बदनाम करो ।
रखो ख़याल तुम अपनों का ।
न कर सौदा सपनों का।

जब ख़्वाब न पुरा होता है।
तब देश हमारा रोता है।।।
जब देश हमारा रोता है।।।
तब नेता ठाट से सोता है।।।
फिर इनको जगाने की ख़ातिर
सब लोग इकट्ठे होते हैं।

जब लोग इकट्ठे होते हैं,
तब इनकी आंखें खुलती हैं।
वो दिन आए, जब लोग जुड़ें
सब‌ मिल जुलकर वो काम करें,
जिस काम से सारे मसलों का
इस दौर के शिक्षित नस्लों का,
चंद मिनटों में ही हल निकले।

ये कब होगा, ये तब होगा

जब धर्म से दूर सियासत हो।
जब कुछ करने की चाहत हो।
© अंजुम अलीनगरी, दरभंगा बिहार

Sunday, July 5, 2026
Topic(s) of this poem: nazm,reveloution,political,indian,youth,urdu
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जंतर-मंतर पर हो रहे प्रदर्शनकारियों को देख कर लगता है कि मद्दे की बात इस दौर में भी हो सकती है
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Anjum Alinagari

Anjum Alinagari

Alinagar, Darbhanga
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