आंखें हैं अश्क बार, तो दिल में है मेरे ग़म ।
हम भूल कैसे सकते हैं, ज़ालिम का वो सितम।
नफ़रत का ले सहारा, पढ़ते हुए को मारा।
थी मौत सामने, था अल्लाह बस हमारा।
चिल्ला रहा था कोई, कोई सिसक रहा था।
सड़कों पे सारा बच्चा, उस दिन हिचक रहा था।
सब कुछ को तोड़ डाला, सर आंख फोड़ डाला।
लेकिन लगा सकता न, वो जामिया में ताला।।
यही जीत है हमारी, कहती है दुनिया सारी ।
अब दूध की नहर फिर, होगी यही जारी।।
आज़ाद थे रहेंगे, हक़ बात ही कहेंगे।
ज़ालिम का जुल्म कह दो, अब हम नहीं सहेंगे।।
इस देश को जगा कर, अंग्रेज़ को भगाया।
भटके हुए को हमने, है रास्ता दिखाया।।
हम ख़ाक से उठे हैं, तब मर्तबा है पाया।
अपनी ज़मीं की खातिर, अपना लहू बहाया।।
तारीख़ ये हमारी, जा कर उसे बताओ।
जो जानते नहीं हैं, तारीख़ को हमारे।।
हम अपनी इस ज़मीं पे, हैं आसमान के तारे।
हर पल को जी रहे हैं, अल्लाह के सहारे।।
हमने तो ज़िंदगी को, है ज़िंदगी बनाया ।
जो फ़र्ज़ है वतन का, उस फ़र्ज़ को निभाया।।
© अंजुम अलीनगरी, दरभंगा बिहार
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