देश की राजनीति का केंद्र 'मुसलमान' है।
क्योंकि मुसलमानों के नाम पर रोटी सेंकना आसान है।
इस देश का मुसलमान ही लगता है, असली विपक्ष है।
और मुसलमानों को निशाना बनाना ही मिडिया का लक्ष्य
है।
जहां देखिए, नज़र उठाकर, हो रहा हू हल्ला है ।
क्या शहर, क्या गांव, ज़हर आलूद मोहल्ला है।
न दिन का अता, न रात का पता है।
यानी, सुकून सबकी ज़िंदगी से लापता है।
भविष्य की चिंता, वर्तमान पर हावी है।
ये कुछ नहीं, बस सियासत की दग़ाबाज़ी है।
धर्म के नाम पर धंधा चल रहा है।
इसलिए नफ़रती नेता, आग उगल रहा है।
समाज अपना रेवाज खोता जा रहा है।
इंसान भी असंवेदनशील होता जा रहा है।
धर्म को ख़तरे में बता कर, डरा कर
अब वोट ख़रीदा नहीं, लुटा जा रहा है।
न मुद्दा है, न मुद्दे की बात है,
सच कहूं, बेहद नाज़ुक हालात है।
इस मुल्क में
फिर से, न ख़त्म होने वाली,
हम सबको लड़ा कर, राज करने वाली
मंदिर मस्जिद की नफ़रती सियासत हो रही है।
जो समाज ही नहीं, मुल्क के लिए ख़तरा है।
इसलिए ज़रूरी है,
ऐसी नफ़रती सियासत को
ज़ालिमों की चाहत को,
मिल के हम चुनौती दे,
और ये क़सम खाएं, धर्म को सियासत से
हम सभी बचाएंगे, बच तभी हम पाएंगे।
वरना दो टके के लोग, जिनको नेता कहते हैं।
कुछ नहीं करेंगे वो, बस हमें लड़ाएंगे।
© अंजुम अलीनगरी, दरभंगा बिहार
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