बाजार... Bajjar Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

बाजार... Bajjar

Rating: 5.0

बाजार
Thursday, November 21,2019
9: 27 AM

बाजार लगा हुआ था
हुस्न सरे आम बिक रहा था
बोली लग रही थी
में मन ही मन गभरा रही थी।

क्या था ऐसा हुस्न में?
मेरा तो मन हो रहा था कब्र जाने में!
क्यों ये लोग अपने आप को नीचा दिखा रहे है?
रात के अंधरे मे तो ये मुँह छिपाने आते है!

में सोचती रही
बोली लगती रही
नॉट उछलते रहे
सब मेरी और हुस्न की बोली लगाते रहे।

इन्होने क्या माँ की कोख से जन्म नही लिया है?
क्या इनके घर में माँ बेटी नहीं है क्या?
मेरा मन ग्लानि से भर गया
आँसू से मन और गला भर आया।

"नारी तू नारायणी " मैंने प्रवचन में सूना
"जगत जननी और जीवन तारणी" मेरा माथा टना
दुनिया को सुनाने और करने के बोल अलग
मेरा भीतरी दिल गया सुलग।

ये जिंदगी यूँ ही चलती रहेगी
कितनी ही बेबस नीलाम होती रहेगी
नाही संसार सुधरेगा और नाही हम
लोगों की बातो में नहीं रहा अब दम।

हसमुख मेहता

बाजार... Bajjar
Thursday, November 21, 2019
Topic(s) of this poem: november,poem
COMMENTS OF THE POEM
Mehta Hasmukh Amathalal 21 November 2019

ये जिंदगी यूँ ही चलती रहेगी कितनी ही बेबस नीलाम होती रहेगी नाही संसार सुधरेगा और नाही हम लोगों की बातो में नहीं रहा अब दम। हसमुख मेहता

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Mehta Hasmukh Amathaal

Mehta Hasmukh Amathaal

Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
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