फांसी दो, फांसी दो
गुरूवार, १ अक्टूबर २०२०
एक ओर बली चढ़ गई
गंगामैया की गोद में समा गई
जीवन लगने लगा है नीरस
घटना हो गई हो हाथरस।
प्रभु कृष्णा की जन्मभुमि
हम कहते है हर-हर नमामि
हो गई है पाप की भूमि
यादवों को मौत समी समय यादवास्थली।
पाप पुकार के बोल रहा
सदा निर्दोषो की जान लेता रहा
माता चीख चीखकर पुकार रही
मेरी बच्ची का अंतिम संस्कार से वंचित रही।
उसीमाँ की कोख तुम्हारा जन्म हुआ
आपके इस कर्म से वह श्रापित हुआ
आप कैसे जानोगे माँ का दर्द?
आपने पार कर दी है सब हद!
मेरे शब्द ही श्राप है
आपने किया बड़ा पाप है
जीवनभर नहीं धो पाओगे!
अपने दिल को भी नहीं समजा पाओगे।
श्रापित धरती श्रापित मनुष्य
आपका घट जाएगा आयुष्य
आपने अक्ष्यम्य अपराध किया है
फांसी ही इसका इलाज है।
जहां नारी असहाय है
और जुल्म की बोलबाला है
वहां का अंत बड़ा बुरा होगा
जीवन के अंतकाल तक भुगतना होगा।
डॉ जाडीआ हसमुख
गुरु जी सादर प्रणाम, आज एक बलि और चढ़ गई, मेरे धरती मैया की गोद मैली हो गई।। सुनो अहिल्या तलवार उठाओ, तुम भी नर संहार कर जाओ।। काट दुष्टों के सिर, तुम भी दुर्गा काली बन दिखाओ।। आभार आपका बहुत - बहुत जो आपने अपनी इतनी सुन्दर कविता से हम सब को सोचने पर मजबूर कर दिया
वहां का अंत बड़ा बुरा होगा जीवन के अंतकाल तक भुगतना होगा। डॉ जाडीआ हसमुख
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Poem: 59293933 - फांसी दो, फांसी दो... Fansi Member: Sharad Bhatia Comment: गुरु जी सादर प्रणाम, आज एक बलि और चढ़ गई, मेरे धरती मैया की गोद मैली हो गई।। सुनो अहिल्या तलवार उठाओ, तुम भी नर संहार कर जाओ।। काट दुष्टों के सिर, तुम भी दुर्गा काली बन दिखाओ।। आभार आपका बहुत - बहुत जो आपने अपनी इतनी सुन्दर कविता से हम सब को सोचने पर मजबूर कर दिया