अंग्रेज़ चले गए,
देश आज़ाद हो गया,
पर हम आज़ाद कहाँ हुए?
आज भी जकड़े हैं हम
गुलामी की बेड़ियों में।
कहीं बंधुआ मज़दूरी है,
कहीं भूख हमारी मजबूरी है,
दबा दी जाती हैं आवाज़ें,
होता है शोषण हमारा —
तन, मन और धन पर अत्याचार।
उलझे हैं हम
जाति-धर्म के जाल में,
पाखंड के जंजाल में।
अपने ही बनाए अंधविश्वास में
अपनी ही मानसिक गुलामी में
सुना है —
एक थे आज़ाद,
पंडित चन्द्रशेखर आज़ाद,
जिन्होंने गुलामी स्वीकार न की,
स्वयं पर गोली दागी,
और सदा के लिए 'आज़ाद' हो गए।
भारत माँ के अमर बलिदानी —
सुखदेव, राजगुरु, भगत सिंह,
खुदीराम बोस, राम प्रसाद बिस्मिल,
राजेंद्र नाथ लाहिड़ी, रोशन सिंह
अशफ़ाक उल्ला खां,
जिन्होंने फाँसी के फंदे को चूमा,
पर गुलामी कभी न स्वीकार की।
उनकी आवाज़ आज भी गूँजती है —
'इंकलाब ज़िंदाबाद!
'इंकलाब ज़िंदाबाद!
भारत माता की जय! '
मंगल पाण्डे, माता दीन, तात्या टोपे
नाना साहब बहादुर शाह ज़फर,
वीर अब्दुल हमीद
जाति धर्म के सारे बंधन तोड़
काट डाली गुलामी बेड़ियाँ
देश की खातिर दे दी
अपने प्राणों की आहुति
ये भारत मां के अमर बलिदानी
हम याद करें इनकी कुर्बानी
हमारे देश की वीरांगनाएं
रानी लक्ष्मी बाई, झलकारी बाई
उदा देवी, बेगम हज़रत महल
आँखों में बग़ावत की आग
दिल में देश प्रेम का जज़्बा
ले तलवार निकल पड़ी रणभूमि पर
अंग्रेजों को ललकारते हुये
अपने देश की खातिर
कर दिय अपने प्राण न्यौछावर
नारी शक्ति अमर रहे!
भारत माता की जय!
भारत माता की जय!
एक थे नेताजी सुभाष चन्द्र बोस,
जिन्होंने आवाज दी -
'तुम मुझे खून दो,
मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा।'
वे बढ़ चले आज़ाद हिन्द फ़ौज के साथ,
हमारे लिए,
भारत माँ के लिए।
पर आज...
हमारे देश के नेता
कहाँ जा रहे हैं?
अपने ही देश को
लूटे खा रहे हैं,
स्वार्थ की जंजीरों में
हम खुद जकड़े पा रहे हैं।
कभी-कभी हम भी नेता बनते हैं,
पर देशभक्त नहीं —
लोभी बन जाते हैं।
भूल जाते हैं
उन अमर बलिदानों को,
जो इस मिट्टी ने जन्मे थे।
अब फिर ज़रूरत है इस देश को
एक नई पुकार की —
नए आज़ाद, नए बिस्मिल,
नए सुभाष के इंकलाब की!
ताकि गूंजे- फिर यह नारा
इंकलाब ज़िंदाबाद! '
'भारत माता की जय'!
✍️ रचना - गया प्रसाद आनन्द 'आनन्द गोंडवी'
#9919060170
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