' दलबदल की राजनीति ' गया प्रसाद आनन्द की कविता Poem by Gaya Prasad Anand 'Anand Gondavi'

' दलबदल की राजनीति ' गया प्रसाद आनन्द की कविता

मलाई खा कर नेता, जब हो जाता है मोटा,
न रह जाती लिज्ज़त, न इज़्ज़त उस पार्टी में।

बदल जाते हैं उसके अल्फ़ाज़ और लिबास,
दलबदल की राजनीति में चलता नया हर दाँव।

कुछ मैली-कुचैली हो जाती हैं उम्मीदें,
अनसुनी बातों से खिन्न—वो चाहता है बदलाव।

बदलते हैं उसके तेवर, चेहरे के हाव-भाव,
चेहरे पर नये चेहरे—नहीं रखता कोई लगाव।

ये जनता को देते धोखा, अपनों को देते घाव,
टिकट की मारा-मारी में बिकते हैं बिन भाव।

कहीं पेंच है, कहीं दाँव, कहीं पतवार बिन नाव,
कोई बैसाखियों के सहारे, कोई दौड़ता बिन पाँव।

तोड़-फोड़ और स्वार्थवाद का ही होता है चुनाव,
कहीं दलबदल की राजनीति, कहीं अंगद का पाँव।
— आनन्द गोण्डवी

' दलबदल की राजनीति ' गया प्रसाद आनन्द की कविता
Monday, February 2, 2026
Topic(s) of this poem: political
COMMENTS OF THE POEM
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success