मलाई खा कर नेता, जब हो जाता है मोटा,
न रह जाती लिज्ज़त, न इज़्ज़त उस पार्टी में।
बदल जाते हैं उसके अल्फ़ाज़ और लिबास,
दलबदल की राजनीति में चलता नया हर दाँव।
कुछ मैली-कुचैली हो जाती हैं उम्मीदें,
अनसुनी बातों से खिन्न—वो चाहता है बदलाव।
बदलते हैं उसके तेवर, चेहरे के हाव-भाव,
चेहरे पर नये चेहरे—नहीं रखता कोई लगाव।
ये जनता को देते धोखा, अपनों को देते घाव,
टिकट की मारा-मारी में बिकते हैं बिन भाव।
कहीं पेंच है, कहीं दाँव, कहीं पतवार बिन नाव,
कोई बैसाखियों के सहारे, कोई दौड़ता बिन पाँव।
तोड़-फोड़ और स्वार्थवाद का ही होता है चुनाव,
कहीं दलबदल की राजनीति, कहीं अंगद का पाँव।
— आनन्द गोण्डवी
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem