गुणगान
मंगलवार, २७ अगस्त २०१९
मै तोरहा प्रेम का राही
नहीं बरती कोईं गोताही
बस चलता गया अपनी पथपर
नहीं आया कभी शक प्रेमपर।
प्रेम की ताकत का मुझे अंदाजा नहीं था
पूरा भरोसा भी नहीं था
पर प्रेम मुझे सदैव खींचता रहा
दिल को जीतकर मनाता रहा।
प्रेम के क्या गुणगान गाऊ?
उसकी महिमा कैसे बताऊं?
बहुत ताकतवर है उसके बोल
कौन कर सकता है उसका मोल?
प्रेम से मुझे जीत लो
उसकी ताकत के बारे में सोच लो
उसके बिना आदमी है पशु समान
नहीं मिलता उसे कोई सन्मान।
मेरी सोच है भिन्न
अब तो बन गया है अंग अभिन्न
प्रेम का रूप बस गया है आँखों में
नहीं मिल पाता सुख कोई तुलना भी करे लाखों में।
हसमुख मेहता
Courtesy: Saieditor.com
मेरी सोच है भिन्न अब तो बन गया है अंग अभिन्न प्रेम का रूप बस गया है आँखों में नहीं मिल पाता सुख कोई तुलना भी करे लाखों में। हसमुख मेहता Courtesy: Saieditor.com Hasmukh Amathalal
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प्रेम की ताकत का मुझे अंदाजा नहीं था पूरा भरोसा भी नहीं था पर प्रेम मुझे सदैव खींचता रहा दिल को जीतकर मनाता रहा......power of love is well executed here. So impressive. This poem is indeed a beautiful poem with nice collocation. Thanks for sharing. This is going to my poems list.10