कस्मे तो खाई थी...Kasme Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

कस्मे तो खाई थी...Kasme

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कस्मे तो खाई थी
शनिवार, २२ अगस्त २०२०

कस्मे तो खाई थी
दोस्ती निभाई भी थी
वादे भी किए थे
पर कोई ना निभाए।

आज कोई भी साथ नहीं
बस, अपने हाथ जगन्नाथ ही सही
कोई आए या ना आए
पर हम तो बढ़ते ही जाए।

जीवन में कुछ तो यूँही हो जाता है
मन-भावन मिल ही जाता है
दिल भी कई बार टूट जाता है
पर अटूट सी छाप छोड़ जाता है।

जैसा बोएगे वैसा ही पाएंगे
कुल्हाड़ी अपने पैर पर ही मारेंगे
पर अपनी जिद नहीं छोड़ेंगे
जहाँ है वहां ही लगा देंगे अड़ंगे।

जीवन मेमक्कारी तो बहुत की है
उसे स्वीकार करना बस बाकी है
अब तो जीवन में एकाकी है
बस जीवन के अंत के लिए टकटकी है

बहुत कुछ हम छीपा लेते है
बस पिपासा बढ़ती ही जाती है
सूना है आदमी कास्वभाव बन्दर जैसा है
बूढ़ा हो जाए फिर भी गुलाट लगाना नहीं भूलता है।

डॉ जाडिआ हसमुख

कस्मे तो खाई थी...Kasme
Saturday, August 22, 2020
Topic(s) of this poem: poem
COMMENTS OF THE POEM
Mehta Hasmukh Amathalal 22 August 2020

oem: 59024419 - कस्मे तो खाई थी...Kasme Member: Sharad Bhatia Comment: गुरुजी सादर प्रणाम, मैं अकेला आया था मैं अकेला ही प्रयास करूँगा चाहे कोई साथ आए ना आए बहुत बेहतरीन कविता

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Sharad Bhatia 22 August 2020

गुरुजी सादर प्रणाम, मैं अकेला आया था मैं अकेला ही प्रयास करूँगा चाहे कोई साथ आए ना आए बहुत बेहतरीन कविता

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Mehta Hasmukh Amathalal 22 August 2020

कस्मे तो खाई थी सूना है आदमी का स्वभाव बन्दर जैसा है बूढ़ा हो जाए फिर भी गुलाट लगाना नहीं भूलता है। डॉ जाडिआ हसमुख

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Mehta Hasmukh Amathaal

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Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
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