खुद को समालो
गुरूवार, १९ सितम्बर २०१९
पानी खलखल बेहता गया
समय भी अपनेआप गुजरता गया
कोई नहीं ठहरता यहाँ!
सब के लिए है दुसरा जहां।
हम वहीँ के वही
बस कोरी है खातावही
जल बिन मछली प्यासी
मन में छायी रहती उदासी।
हम क्यों रहते उदास
क्यों लगी रहती आस?
क्यों देखकर जलते रहते आसपास?
क्यों निकल नहीं पाते मन की भड़ास?
मन ही है चंचल
पानी की तरह तरल
थोड़ी सी बात से मच जाती हलचल
मुज को अच्छी लगती पंखिओं की कलबल।
हम नहीं सुधरेंगे।
कीड़े मकोड़ों की तरह रेंगते रहेंगे
अपने आप को नहीं ढालेंगे
अंत तक बस ऐसे ही रहेंगे।
कितनी जिजीविषा
पूरी नहीं होती आशा
दुसरो के प्रति दिल में जलन
यही तो है कारण "पतन"
खुद को समालो
अपने आप ढालो
मन की अशांति से बचालो
अपना जीवन संवार लो।
हसमुख मेहता
Courtesy Picture: Newyork Times
खुद को समालो अपने आप ढालो मन की अशांति से बचालो अपना जीवन संवार लो। हसमुख मेहता Courtesy Picture: Newyork Times Hasmukh Amathalal
Mind is very fast as many, many thoughts come within it. We should stabilize mind of course. An interesting poem is brilliantly penned.10
Amrut Shrimali Ji..sir.. bahut Sundar 1 Delete or hide this Like · Reply · See Translation · 1h
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Amrut Shrimali 13 mutual friends 1 Edit or delete this Like · Reply · 1m