उम्र एक सीमा में हो तो अच्छी लगती है Poem by M. Asim Nehal

उम्र एक सीमा में हो तो अच्छी लगती है

साठ तक तो हर शाम हसीन लगती है,
बच्चों की हँसी में जान बसती है,
हाथ में लाठी नहीं, ख्वाहिशें चलती हैं,
उम्र तब तक साथी सी लगती है।

फिर एक मोड़ आता है धीरे-धीरे,
आईना भी अब सच कहने से डरता है,
घुटने थकते हैं, पर यादें भागती हैं,
और दिल पुराने खतों में उतरता है।

जिनके लिए जीए थे, वो अपने घरों में मसरुफ़ हैं,
फ़ोन पर बस 'ठीक हूँ' के जवाब हैं,
घर भरा है फिर भी खाली लगता है,
और हम भीड़ में भी तन्हा लगते हैं।

लंबी उम्र की दुआ थी, अब सवाल बन गई,
सेहत जो साथ छूटे, ज़िंदगी मलाल बन गई।
अपनों पर कभी बोझ न बन जाऊँ इस डर में,
हर सुबह अधूरी, हर शाम खयाल बन गई।

तो ऐ खुदा, लंबी उम्र न दे,
बस अच्छी उम्र दे,
जब तक चलूँ अपने पैरों पर,
जब तक बाँट सकूँ प्यार और हँसी,
बस उतनी उम्र दे।

क्योंकि उम्र एक सीमा में हो तो ज़िंदगी लगती है,
जब हद से बढ़ जाए तो...
सिर्फ़ गिनी हुई साँसें लगती है।

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